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रामाज्ञा प्रश्न / द्वितीय सर्ग / सप्तक 4 / श्लोक 4

रामाज्ञा प्रश्न द्वितीय सर्ग सप्तक 4 श्लोक 4 — समर्थ और शीलनिधि स्वामी श्रीराम की सेवा; नौकरी और सेवा-कार्य का मंगलमय शकुन।

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सात सर्ग, प्रत्येक सर्ग में सात सप्तक और प्रत्येक सप्तक में सात दोहे — यही ॥रामाज्ञा प्रश्न॥ की सरल किंतु सुगठित संरचना है। यह दोहा द्वितीय सर्ग के चौथे सप्तक में क्रम से चौथा है — यहाँ वियोग, प्रतीक्षा और भरत के प्रेम के भाव मिलते हैं।

श्रीराम की सेवा — नौकरी और सेवा-कार्य के लिए मंगलमय शकुन।

मूल दोहा: साहिब समरथ सीलनिधि सेवत सुलभ सुजान। राम सुमिरि सेइअ सुप्रभ, सगुन कहब कल्यान॥४॥

शब्दार्थ:

  • साहिब = स्वामी, मालिक
  • समरथ = शक्ति-संपन्न
  • सीलनिधि = शील के भंडार
  • सेवत = सेवा करने में
  • सुलभ = सहज उपलब्ध
  • सुजान = परम सयाने, ज्ञानी
  • सेइअ = सेवा करो
  • सुप्रभ = उत्तम स्वामी

साहिब समरथ सीलनिधि = श्रीराम शक्ति-संपन्न और शील के भंडार स्वामी हैं। सगुन कहब कल्यान = इस शकुन को मंगलमय कहेंगे।

भावार्थ / व्याख्या:

श्रीराम शक्ति-संपन्न, शील-निधान एवं परम सयाने स्वामी हैं; उनकी सेवा अत्यंत सुलभ है। उन श्रीराम का स्मरण करके उत्तम स्वामी की सेवा करो।

तुलसीदास जी कहते हैं कि इस शकुन को नौकरी आदि के लिए हम मंगलमय कहेंगे।

यह दोहा ‘अच्छा स्वामी’ चुनने की महत्ता बताता है। एक समर्थ और शीलवान स्वामी के अधीन कार्य करने पर योग्यता का सम्मान होता है, जबकि अयोग्य के अधीन प्रतिभा नष्ट हो जाती है। इसीलिए यह दोहा नौकरी और सेवा-कार्य से जुड़े प्रश्नों में सर्वाधिक शुभ माना गया है।

शकुन फल:

यह शकुन नौकरी और सेवा-कार्य के लिए मंगलमय है। निम्नलिखित प्रश्नों में:

  • नई नौकरी, नियुक्ति या सेवा का अवसर
  • वर्तमान नौकरी में बने रहने या बदलने का निर्णय
  • अच्छे मालिक, संस्था या कंपनी की तलाश
  • पदोन्नति या वेतन-वृद्धि
  • किसी के अधीन कार्य करने संबंधी प्रश्न

इस दोहे के आने पर नौकरी और सेवा-कार्य के लिए मंगलमय संकेत है। जो अवसर सामने है, उसमें आपकी योग्यता का सम्मान होगा।

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