रामाज्ञा प्रश्न / द्वितीय सर्ग / सप्तक 4 / श्लोक 3
रामाज्ञा प्रश्न द्वितीय सर्ग सप्तक 4 श्लोक 3 — भरतजी के नाम और निर्मल गुणों का स्मरण; सेवक, मित्र और भाइयों से जुड़े कार्यों में सफलता।
शकुन शुभ है या अशुभ — यह निर्णय ॥रामाज्ञा प्रश्न॥ में उसी प्रसंग से होता है जो चुने हुए दोहे में वर्णित है। यह दोहा द्वितीय सर्ग के चौथे सप्तक में क्रम से तीसरा है — यहाँ वियोग, प्रतीक्षा और भरत के प्रेम के भाव मिलते हैं।
भरतजी का स्मरण — सेवक, मित्र और भाइयों से जुड़े प्रश्नों का उत्तर।
मूल दोहा: सेवक सखा सुबंधु हित सगुन बिचारु बिसेषि। भरत नाम गुनगन बिमल सुमिरि सत्य सब लेखि॥३॥
शब्दार्थ:
- सेवक = सेवक, कर्मचारी
- सखा = मित्र
- सुबंधु = अच्छे भाई
- हित = हितैषी
- बिसेषि = विशेष रूप से
- गुनगन = गुणों का समूह
- बिमल = निर्मल
- सत्य सब लेखि = सब सत्य और सफल समझो
सेवक सखा सुबंधु हित = सेवकों, मित्रों और भाइयों के लिए। सुमिरि सत्य सब लेखि = स्मरण करके सब कार्य सफल समझो।
भावार्थ / व्याख्या:
विशेष रूप से सेवकों, मित्रों तथा अनुकूल भाइयों के लिए इस शकुन का विचार है। श्रीभरतजी के नाम तथा उनके निर्मल गुणों का स्मरण करके सब कार्य सत्य और सफल समझो।
भरतजी रामायण में त्याग और भ्रातृ-प्रेम के सर्वोच्च आदर्श हैं। राज्य मिलने पर भी उन्होंने उसे स्वीकार नहीं किया और श्रीराम की पादुका रखकर शासन चलाया।
शकुन की दृष्टि से यह दोहा उन प्रश्नों में विशेष शुभ है जो संबंधों से जुड़े हैं — कर्मचारी, मित्र, भाई। यह संकेत देता है कि आपके साथ जुड़े लोग विश्वसनीय और सहयोगी सिद्ध होंगे।
शकुन फल:
यह शकुन सेवकों, मित्रों और भाइयों से जुड़े प्रश्नों में शुभ है। विशेषकर:
- कर्मचारी, सेवक या टीम के सदस्य से जुड़ा प्रश्न
- मित्रता, विश्वास और सहयोग
- भाई-बहन या परिवार के सदस्यों से संबंध
- किसी को कोई ज़िम्मेदारी सौंपना
- संपत्ति या व्यवसाय में भाइयों की भागीदारी
इस दोहे के आने पर सभी कार्य सत्य और सफल समझें। आपके सेवक, मित्र और भाई विश्वसनीय सिद्ध होंगे — उन पर भरोसा किया जा सकता है।
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