रामाज्ञा प्रश्न / द्वितीय सर्ग / सप्तक 4 / श्लोक 2
रामाज्ञा प्रश्न द्वितीय सर्ग सप्तक 4 श्लोक 2 — शत्रुघ्नजी के चरण-स्मरण से वाद-विवाद, संघर्ष और पराए नगर में विजय का शकुन।
॥रामाज्ञा प्रश्न॥ तुलसीदास जी की उन रचनाओं में गिना जाता है जो भक्ति के साथ-साथ व्यावहारिक मार्गदर्शन भी देती हैं। यह दोहा द्वितीय सर्ग के चौथे सप्तक में क्रम से दूसरा है — यहाँ वियोग, प्रतीक्षा और भरत के प्रेम के भाव मिलते हैं।
शत्रुघ्नजी का स्मरण — वाद-विवाद और प्रतिस्पर्धा में विजय।
मूल दोहा: सुमिरि सत्रु सूदन चरन सुमंगल मानि। परपुर बाद बिबाद जय जूझ जुआ जय जानि॥२॥
शब्दार्थ:
- सत्रु सूदन = शत्रुओं का नाश करने वाले (शत्रुघ्नजी)
- चरन = चरण
- सुमंगल मानि = मंगलप्रद मानो
- परपुर = दूसरे के नगर में
- बाद बिबाद = वाद-विवाद
- जय = विजय
- जूझ = युद्ध, संघर्ष
- जुआ = द्यूत, दाँव
सुमिरि सत्रु सूदन चरन = शत्रुघ्नजी के चरणों का स्मरण करो। जूझ जुआ जय जानि = संघर्ष और दाँव में भी विजय समझो।
भावार्थ / व्याख्या:
श्रीशत्रुघ्नजी के चरणों का स्मरण करो — इस शकुन को मंगलप्रद मानो। दूसरे के नगर में वाद-विवाद में विजय तथा संघर्ष और दाँव में भी विजय समझो।
शत्रुघ्नजी का नाम ही ‘शत्रु का नाश करने वाला’ है। रामायण में वे लवणासुर का वध कर मथुरा के शासक बने — अर्थात् पराए क्षेत्र में जाकर विजय प्राप्त की।
शकुन की दृष्टि से यह दोहा प्रतिस्पर्धा और संघर्ष से जुड़े प्रश्नों में विशेष शुभ है। ‘परपुर’ अर्थात् दूसरे के क्षेत्र में विजय का उल्लेख इसे और विशिष्ट बनाता है — जहाँ आप बाहरी हैं, वहाँ भी जीत मिलेगी।
शकुन फल:
यह शकुन विवाद और प्रतिस्पर्धा में विजय का सूचक है। निम्नलिखित प्रश्नों में:
- मुकदमा, वाद-विवाद या कानूनी लड़ाई
- प्रतियोगिता, खेल या चुनाव
- दूसरे शहर या क्षेत्र में जाकर मुकाबला
- व्यापारिक प्रतिस्पर्धा या बोली
- किसी शत्रु या विरोधी से जुड़ा प्रश्न
इस दोहे के आने पर विवाद और प्रतिस्पर्धा में विजय का संकेत मिलता है। पराए क्षेत्र में भी सफलता मिलेगी — निर्भय होकर आगे बढ़ें।
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