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रामाज्ञा प्रश्न / द्वितीय सर्ग / सप्तक 4 / श्लोक 1

रामाज्ञा प्रश्न द्वितीय सर्ग सप्तक 4 श्लोक 1 — हनुमानजी के स्मरण से कठिन और सरल दोनों कार्यों में करतल-सिद्धि का शुभ शकुन।

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इस ग्रंथ में उत्तर सीधा नहीं, प्रसंग के माध्यम से मिलता है — जो प्रसंग सामने आए, उसी का भाव प्रश्न का फल बन जाता है। यह दोहा द्वितीय सर्ग के चौथे सप्तक में क्रम से पहला है — यहाँ वियोग, प्रतीक्षा और भरत के प्रेम के भाव मिलते हैं।

यह सप्तक नाम-स्मरण की महिमा का है — आरंभ हनुमानजी से।

मूल दोहा: धीर बीर रघुबीर प्रिय सुमिरि समीर कुमारु। अगम सुगम सब काज करु, करतल सिद्धि बिचारु॥१॥

शब्दार्थ:

  • धीर = धैर्यशाली
  • बीर = वीर
  • रघुबीर प्रिय = रघुनाथजी के प्रिय
  • समीर कुमारु = पवनपुत्र (हनुमानजी)
  • अगम = कठिन
  • सुगम = सरल
  • करतल सिद्धि = हथेली में आई सफलता

सुमिरि समीर कुमारु = पवनपुत्र हनुमानजी का स्मरण करके। करतल सिद्धि बिचारु = सफलता हाथ में आई हुई समझो।

भावार्थ / व्याख्या:

धैर्यशाली, वीर और श्रीरघुनाथजी के प्रिय श्रीहनुमानजी का स्मरण करके जो भी कार्य करो — चाहे वह कठिन हो या सरल — उसकी सफलता हाथ में आई हुई समझो।

इस दोहे में ‘अगम सुगम’ शब्द विशेष हैं। तुलसीदास जी कठिन और सरल में भेद नहीं करते — दोनों में समान सफलता का आश्वासन देते हैं।

हनुमानजी साहस, सेवा और असंभव को संभव बनाने के प्रतीक हैं। समुद्र लाँघना असंभव लगता था, पर उन्होंने कर दिखाया। इसीलिए यह शकुन उन प्रश्नों में विशेष शुभ है जहाँ कार्य कठिन लग रहा हो और साहस की आवश्यकता हो।

शकुन फल:

यह शकुन हर प्रकार के कार्य में सफलता का सूचक है। निम्नलिखित प्रश्नों में:

  • कोई भी कार्य — कठिन हो या सरल
  • असंभव लगने वाली चुनौती या लक्ष्य
  • साहस और बल की आवश्यकता वाला कार्य
  • बाधा, शत्रु या भय से मुक्ति
  • मंगलवार या शनिवार को आरंभ किया जाने वाला काम

इस दोहे के आने पर सफलता हाथ में आई हुई समझें। हनुमानजी का स्मरण करके निःसंकोच कार्य आरंभ करें — कठिन भी सरल हो जाएगा।

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