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रामाज्ञा प्रश्न / द्वितीय सर्ग / सप्तक 1 / श्लोक 3

रामाज्ञा प्रश्न द्वितीय सर्ग सप्तक 1 श्लोक 3 — राम-सीता का वनवास करोड़ों अपशकुनों के समान; सर्वस्व-नाश की चेतावनी देने वाला अशुभ शकुन।

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शकुन-विचार के लिए भक्तजन सदियों से ॥रामाज्ञा प्रश्न॥ का सहारा लेते आए हैं — श्रद्धापूर्वक चुनी गई संख्या ही उत्तर तक पहुँचाती है। यह पहले सप्तक का तीसरा दोहा है। द्वितीय सर्ग श्रीराम के राज्याभिषेक की तैयारी से लेकर वनगमन तक के प्रसंगों को समेटे हुए है।

राम-सीता का वनवास — यह दोहा अत्यंत अशुभ माना गया है।

मूल दोहा: कुसमय कुसगुन कोटि सम, राम सीय बन बास। अनरथ अनभल अवधि जग, जानब सरबस नास॥३॥

शब्दार्थ:

  • कुसमय = बुरा समय
  • कुसगुन = अपशकुन
  • कोटि सम = करोड़ों के समान
  • बन बास = वनवास
  • अनरथ = अनर्थ
  • अनभल = बुराई
  • अवधि = सीमा, चरम
  • सरबस = सर्वस्व
  • नास = विनाश

कुसमय कुसगुन कोटि सम = करोड़ों बुरे समय और अपशकुनों के समान। जानब सरबस नास = सर्वस्व का विनाश समझो।

भावार्थ / व्याख्या:

श्रीराम और जानकीजी का वनवास करोड़ों बुरे समय तथा अपशकुनों के समान है। यह संसार में अनर्थ और बुराई की सीमा है। तुलसीदास जी कहते हैं कि इसे सर्वस्व का विनाश समझो।

यह रामाज्ञा प्रश्न के सबसे अशुभ दोहों में गिना जाता है। जब स्वयं भगवान को वन जाना पड़े, तो उस क्षण से बड़ा दुर्भाग्य क्या हो सकता है।

शकुन की दृष्टि से यह दोहा स्पष्ट निषेध है। यह बताता है कि वर्तमान में जो कार्य या निर्णय विचाराधीन है, उसमें बड़ी हानि की प्रबल संभावना है। इस समय कोई नया आरंभ, कोई निवेश और कोई यात्रा नहीं करनी चाहिए। परंतु स्मरण रहे — रामायण में वही वनवास आगे चलकर लोक-कल्याण का कारण बना। अतः निराश न हों, केवल प्रतीक्षा करें।

शकुन फल:

यह शकुन अत्यंत अशुभ है और सर्वस्व-हानि की चेतावनी देता है। इन प्रश्नों में विशेष सतर्कता:

  • नया व्यापार, निवेश या बड़ा आर्थिक निर्णय
  • संपत्ति की खरीद-बिक्री या बड़ा लेन-देन
  • यात्रा, स्थान परिवर्तन या घर छोड़ना
  • कोई भी नया आरंभ या जोखिम भरा कदम
  • पारिवारिक बँटवारा या अलगाव

इस दोहे के आने पर हर प्रकार का नया आरंभ स्थगित कर देना चाहिए। यह समय संभलने और प्रतीक्षा करने का है, आगे बढ़ने का नहीं। श्रीराम का स्मरण, धैर्य और सत्संग ही इस काल में सहारा है — समय अवश्य बदलेगा।

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