रामाज्ञा प्रश्न / प्रथम सर्ग / सप्तक 7 / श्लोक 3
रामाज्ञा प्रश्न प्रथम सर्ग सप्तक 7 श्लोक 3 — नगरवासियों की प्रसन्नता, मुनियों की जयध्वनि और देवताओं की पुष्प-वर्षा; सुमंगल का मूल शकुन।
शकुन-विचार के लिए भक्तजन सदियों से ॥रामाज्ञा प्रश्न॥ का सहारा लेते आए हैं — श्रद्धापूर्वक चुनी गई संख्या ही उत्तर तक पहुँचाती है। प्रथम सर्ग, सातवें सप्तक और उसमें तीसरा दोहा — यहाँ वंदना का भाव और शकुन का निर्णय दोनों साथ-साथ चलते हैं।
नगरवासियों की प्रसन्नता और देवताओं की पुष्प-वर्षा — मंगल का मूल।
मूल दोहा: मुदित नगर नर नारि सब, सगुन सुमंगल मूल। जय धुनि मुनि दुंदुभी बाजहिं बरषहिं फुल॥३॥
शब्दार्थ:
- मुदित = प्रसन्न
- नगर नर नारि = नगर के स्त्री-पुरुष
- सगुन सुमंगल मूल = मंगल का मूल शकुन
- जय धुनि = जयध्वनि
- मुनि = मुनिगण
- दुंदुभी = नगाड़े
- बरषहिं फुल = पुष्प-वर्षा करते हैं
मुदित नगर नर नारि सब = नगर के सभी स्त्री-पुरुष प्रसन्न हैं। बाजहिं बरषहिं फुल = नगाड़े बजते हैं और पुष्प-वर्षा होती है।
भावार्थ / व्याख्या:
अयोध्या नगर के सभी स्त्री-पुरुष प्रसन्न हैं। मुनिगण जयध्वनि कर रहे हैं और देवता नगाड़े बजाकर पुष्प-वर्षा कर रहे हैं। तुलसीदास जी कहते हैं कि यह शकुन सुमंगल का मूल अर्थात् मंगलदायी है।
इस दोहे में तीनों लोकों की प्रसन्नता एक साथ दिखाई देती है — नगरवासी प्रसन्न, मुनि प्रसन्न और देवता प्रसन्न। जब मनुष्य, ऋषि और देवता तीनों एक साथ किसी कार्य का अनुमोदन करें, तो वह कार्य निश्चित रूप से धर्मसम्मत है।
शकुन की दृष्टि से यह दोहा मंगल का मूल कहा गया है — अर्थात् यह केवल एक शुभ संकेत नहीं, बल्कि आगे आने वाले सभी मंगलों की जड़ है।
शकुन फल:
यह शकुन सुमंगल का मूल है। निम्नलिखित प्रश्नों में परिणाम अत्यंत शुभ रहेगा:
- कोई भी शुभ कार्य या मांगलिक आयोजन
- सार्वजनिक स्वीकृति, समर्थन या लोकप्रियता
- धार्मिक अनुष्ठान, यज्ञ या पूजा
- समाज या समूह से जुड़े निर्णय
- दीर्घकालिक शुभ परिणाम की आशा
इस दोहे के आने पर सुमंगल का मूल संकेत मिलता है। कार्य को सर्वत्र समर्थन मिलेगा और उससे आगे भी मंगल की शृंखला चलेगी।
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