रामाज्ञा प्रश्न / प्रथम सर्ग / सप्तक 7 / श्लोक 2
रामाज्ञा प्रश्न प्रथम सर्ग सप्तक 7 श्लोक 2 — सखियों द्वारा आरती और अनुरूप जोड़ियों को देखकर भाग्य की सराहना; उत्तम प्रश्न-फल।
॥रामाज्ञा प्रश्न॥ में तुलसीदास जी ने रामकथा के प्रसंगों को ऐसे दोहों में ढाला है कि हर दोहा प्रश्नकर्ता को सीधा संकेत दे जाता है। प्रथम सर्ग, सातवें सप्तक और उसमें दूसरा दोहा — यहाँ वंदना का भाव और शकुन का निर्णय दोनों साथ-साथ चलते हैं।
सखियों द्वारा आरती और भाग्य की सराहना — उत्तम प्रश्न-फल।
मूल दोहा: करहिं निछावरि आरती, उमगि उमगि अनुराग। बर दुलहिन अनुरूप लखि सखी सराहहिं भाग॥२॥
शब्दार्थ:
- निछावरि = न्योछावर
- आरती = आरती
- उमगि उमगि = उमंग से भरकर, बार-बार
- अनुराग = प्रेम
- अनुरूप = एक-दूसरे के योग्य
- लखि = देखकर
- सखी = सखियाँ
- सराहहिं भाग = भाग्य की प्रशंसा करती हैं
करहिं निछावरि आरती = आरती करके न्योछावर करती हैं। सखी सराहहिं भाग = सखियाँ भाग्य की प्रशंसा करती हैं।
भावार्थ / व्याख्या:
सखियाँ प्रेम से बार-बार उमंग में आकर आरती करती हैं और न्योछावर करती हैं। वर तथा वधुओं को एक-दूसरे के अनुरूप देखकर वे अपने भाग्य की प्रशंसा करती हैं।
‘अनुरूप’ शब्द इस दोहे का केंद्र है। इसका अर्थ है — योग्य जोड़ी, जहाँ दोनों पक्ष एक-दूसरे के अनुकूल हों। ऐसा संयोग सौभाग्य से ही बनता है।
शकुन की दृष्टि से यह दोहा उत्तम फल का सूचक है, विशेषकर विवाह और संबंध संबंधी प्रश्नों में। यह संकेत देता है कि जो जोड़ी या साझेदारी बन रही है, वह अनुकूल और प्रशंसनीय होगी।
शकुन फल:
यह शकुन उत्तम है। निम्नलिखित प्रश्नों में परिणाम अनुकूल रहेगा:
- विवाह का रिश्ता और जोड़ी का मेल
- व्यावसायिक साझेदारी की अनुकूलता
- किसी संबंध या गठजोड़ की उपयुक्तता
- समाज या मित्रों से प्रशंसा और समर्थन
- सौभाग्य और अनुकूल संयोग से जुड़े प्रश्न
इस दोहे के आने पर प्रश्न-फल उत्तम है। जो संबंध या साझेदारी बन रही है, वह अनुकूल है और उसकी सराहना होगी।
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