रामाज्ञा प्रश्न / प्रथम सर्ग / सप्तक 6 / श्लोक 2
रामाज्ञा प्रश्न प्रथम सर्ग सप्तक 6 श्लोक 2 — मन की साध पूर्ण होने पर वर-वधुओं और दोनों समाजों की प्रसन्नता; उत्तम प्रश्न-फल।
॥रामाज्ञा प्रश्न॥ तुलसीदास जी की उन रचनाओं में गिना जाता है जो भक्ति के साथ-साथ व्यावहारिक मार्गदर्शन भी देती हैं। इस छठे सप्तक के दूसरा दोहे में प्रथम सर्ग की वही धारा है जो आश्वस्त करती है कि आरंभ शुभ हो तो अंत भी शुभ होता है।
मन की साध पूर्ण होने का प्रसंग — उत्तम प्रश्न-फल।
मूल दोहा: बर दुलहिनि सब परसपर मुदित पाइ मनकाम। चारु चारि जोरी निरखि दुहूँ समाज अभिराम॥२॥
शब्दार्थ:
- बर = वर, दूल्हा
- दुलहिनि = दुल्हन
- परसपर = परस्पर, आपस में
- मुदित = प्रसन्न
- मनकाम = मन की कामना
- चारु चारि जोरी = चारों सुंदर जोड़ियाँ
- निरखि = देखकर
- दुहूँ समाज = दोनों समाज
- अभिराम = अत्यंत सुंदर, प्रसन्न
मुदित पाइ मनकाम = मन की कामना पूर्ण होने से प्रसन्न हैं। दुहूँ समाज अभिराम = दोनों समाज अत्यंत सुखी हैं।
भावार्थ / व्याख्या:
मन की साध पूर्ण होने से सभी वर और दुल्हनें परस्पर प्रसन्न हो रही हैं। इन सुंदर चारों जोड़ियों को देखकर अयोध्या और जनकपुर — दोनों के समाज अत्यंत सुखी हैं।
इस दोहे की विशेषता यह है कि इसमें प्रसन्नता एकतरफा नहीं है। वर भी प्रसन्न, वधू भी प्रसन्न, और दोनों पक्षों के समाज भी प्रसन्न। ऐसी सर्वपक्षीय संतुष्टि दुर्लभ होती है।
शकुन की दृष्टि से यह दोहा उत्तम फल का सूचक है, विशेषकर उन प्रश्नों में जहाँ दो पक्षों की सहमति या आपसी संतोष आवश्यक हो। यह बताता है कि निर्णय ऐसा होगा जिससे सभी संतुष्ट रहेंगे।
शकुन फल:
यह शकुन उत्तम है और सर्वपक्षीय संतोष का सूचक है। निम्नलिखित प्रश्नों में:
- विवाह या रिश्ते में दोनों पक्षों की सहमति
- मन की कामना या इच्छा की पूर्ति
- समझौता, बँटवारा या आपसी निपटारा
- व्यापारिक सौदा जिसमें दोनों पक्ष लाभ में हों
- पारिवारिक निर्णय जिसमें सबकी सहमति चाहिए
इस दोहे के आने पर प्रश्न-फल उत्तम है। मन की साध पूरी होगी और निर्णय से सभी पक्ष संतुष्ट रहेंगे।
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