रामाज्ञा प्रश्न / प्रथम सर्ग / सप्तक 6 / श्लोक 1
रामाज्ञा प्रश्न प्रथम सर्ग सप्तक 6 श्लोक 1 — जनकजी का अपार दहेज जिसे देख दिक्पाल भी सिहाते; सुख-संपत्ति और मंगल-परंपरा का शकुन।
इस ग्रंथ में उत्तर सीधा नहीं, प्रसंग के माध्यम से मिलता है — जो प्रसंग सामने आए, उसी का भाव प्रश्न का फल बन जाता है। इस छठे सप्तक के पहला दोहे में प्रथम सर्ग की वही धारा है जो आश्वस्त करती है कि आरंभ शुभ हो तो अंत भी शुभ होता है।
जनकजी द्वारा दिया गया दहेज — सुख, संपत्ति और संतोष का शकुन।
मूल दोहा: दाइज भयउ अनेक बिधि, सुनि सिहाहिं दिसिपाल। सुख संपति संतोषमय, सगुन सुमंगल माल॥१॥
शब्दार्थ:
- दाइज = दहेज, उपहार
- भयउ = हुआ
- अनेक बिधि = अनेक प्रकार से
- सिहाहिं = ईर्ष्या करते हैं, सिहाते हैं
- दिसिपाल = दिक्पाल (दिशाओं के रक्षक देवता)
- संतोषमय = संतोष देने वाला
- सुमंगल माल = मंगल की परंपरा, माला
सुनि सिहाहिं दिसिपाल = सुनकर दिक्पाल भी ईर्ष्या करने लगते हैं। सगुन सुमंगल माल = यह शकुन मंगल-परंपरा का सूचक है।
भावार्थ / व्याख्या:
महाराज जनक द्वारा अनेक प्रकार से दहेज दिया गया, जिसे सुनकर दिक्पाल — दिशाओं के रक्षक देवता — भी सिहाने लगे।
तुलसीदास जी कहते हैं कि यह शकुन सुख, संपत्ति और संतोष देने वाला तथा श्रेष्ठ मंगल-परंपरा का सूचक है।
‘सुमंगल माल’ शब्द ध्यान देने योग्य है। माला में एक मनका नहीं, अनेक होते हैं और सब एक सूत्र में पिरोए रहते हैं। इसी प्रकार यह शकुन एक बार का लाभ नहीं, बल्कि मंगलों की एक शृंखला का संकेत देता है — एक शुभ घटना दूसरी को जन्म देगी।
शकुन फल:
यह शकुन सुख, संपत्ति और संतोष का सूचक है। निम्नलिखित प्रश्नों में:
- धन, संपत्ति या उपहार की प्राप्ति
- विवाह में लेन-देन या व्यवस्था संबंधी प्रश्न
- विरासत, बँटवारा या पैतृक संपत्ति
- व्यापार में अप्रत्याशित लाभ
- लगातार शुभ अवसरों की शृंखला
इस दोहे के आने पर सुख, संपत्ति और संतोष की प्राप्ति का संकेत मिलता है। लाभ एक बार नहीं, लगातार होगा — और उससे मन को संतोष भी मिलेगा।
आस्था और भक्ति के हमारे मिशन का समर्थन करेंहर सहयोग, चाहे बड़ा हो या छोटा, फर्क डालता है! आपका सहयोग हमें इस मंच को बनाए रखने और पौराणिक कहानियों को अधिक लोगो तक फैलाने में मदद करता है। सहयोग करें |
टिप्पणियाँ बंद हैं।