रामायण, महाभारत, गीता, वेद तथा पुराण की कथाएं

रामाज्ञा प्रश्न / प्रथम सर्ग / सप्तक 3 / श्लोक 6

रामाज्ञा प्रश्न प्रथम सर्ग सप्तक 3 श्लोक 6 — राम-विमुखता से हानि, मृत्यु और दरिद्रता; राक्षसों के नाश का दृष्टांत और सावधानी का शकुन।

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॥रामाज्ञा प्रश्न॥ के कुल ३४३ दोहे सात सर्गों में इस प्रकार बँटे हैं कि हर सर्ग में ४९ दोहे आते हैं। प्रथम सर्ग के तीसरे सप्तक का यह छठा दोहा शुभारंभ, यात्रा और धर्म-कार्य से जुड़े प्रश्नों में विशेष रूप से देखा जाता है।

यह दोहा चेतावनी देता है — राम-विमुखता का परिणाम हानि और कष्ट है।

मूल दोहा: हानि मीचु दारिद आदि अंत गत बीच। राम बिमुख अघ आपने गये निसाचर नीच॥६॥

शब्दार्थ:

  • हानि = नुकसान
  • मीचु = मृत्यु
  • दारिद = दरिद्रता, गरीबी
  • आदि अंत गत बीच = आरंभ, अंत और मध्य — सभी दशाओं में
  • राम बिमुख = श्रीराम से विमुख, विरुद्ध
  • अघ = पाप
  • निसाचर = राक्षस
  • नीच = अधम

राम बिमुख अघ आपने = श्रीराम से विमुख होकर अपने ही पाप से। गये निसाचर नीच = नीच राक्षस नष्ट हो गए।

भावार्थ / व्याख्या:

तुलसीदास जी इस दोहे में स्पष्ट चेतावनी देते हैं — श्रीराम से विमुख होने पर आदि, अंत और मध्य, अर्थात् हर दशा में हानि, मृत्यु, दरिद्रता और कष्ट ही मिलता है।

प्रमाण के रूप में वे राक्षसों का उदाहरण देते हैं। ताड़का, सुबाहु, खर-दूषण, रावण — इन सबके पास शक्ति थी, वैभव था, सेना थी। परंतु राम-विमुखता के कारण वे अपने ही पापों से नष्ट हो गए।

शकुन की दृष्टि से यह दोहा सावधानी का संकेत है। यह बताता है कि वर्तमान में जो मार्ग चुना जा रहा है, उसमें कहीं अधर्म, अन्याय या किसी का अहित तो नहीं है। यदि है, तो परिणाम हानिकारक होगा — चाहे तात्कालिक लाभ कितना ही आकर्षक क्यों न दिखे।

शकुन फल:

यह शकुन सावधानी और आत्म-निरीक्षण का संकेत देता है। निम्नलिखित प्रश्नों में सतर्क रहें:

  • ऐसा कार्य जिसमें अनुचित साधन का प्रयोग हो
  • किसी का अहित या शोषण करने वाला निर्णय
  • अत्यधिक लोभ या जल्दबाज़ी से लिया गया कदम
  • शत्रुता, बदला या विवाद बढ़ाने वाला कार्य
  • स्वास्थ्य या धन की बड़ी हानि की आशंका

इस दोहे के आने पर वर्तमान मार्ग पर पुनर्विचार आवश्यक है। यदि कार्य में कोई अनुचित पक्ष है तो उसे तुरंत सुधारें। धर्म और सत्य के मार्ग पर लौटने से ही स्थिति सुधरेगी।

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