रामायण, महाभारत, गीता, वेद तथा पुराण की कथाएं

श्री मधुराष्टकम्

श्री मधुराष्टकम् स्त्रोत अखण्ड भूमण्डलाचार्य जगद्गुरु महाप्रभु श्रीमद वल्लभाचार्य जी द्वारा रचित है। संस्‍कृत में होने के बावजूद यह स्त्रोत गाने और समझने में एकदम आसान है। इसमें भगवन श्री कृष्‍ण और उनकी मनोहारी लीलाओं का वर्णन किया गया है।

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मधुराष्टकं में महाप्रभु श्रीवल्लभाचार्य ने बालरूप श्रीकृष्ण की मधुरता का मधुरतम वर्णन किया है। श्रीकृष्ण के प्रत्येक अंग एवं गतिविधि मधुर है और उनके संयोग से अन्य सजीव और निर्जीव वस्तुएं भी मधुरता को प्राप्त कर लेती हैं। इस सृष्टि में जो कुछ भी मधुरता है उसको श्रीकृष्ण की मधुरता का एक अंश समझते हुए भक्तों को निरंतर श्रीमाखनचोर का स्मरण करना चाहिए। मधुराष्टकं पुष्टिमार्गीय वैष्णवों के नित्य पठनीय ग्रंथों में अपूर्व स्थान रखता है, इसके नित्य पठन से व्यक्ति सब का प्रिय हो जाता है और भगवान श्रीकृष्ण की पराभक्ति प्राप्त कर लेता है। मधुराष्टकं की मधुरता का वर्णन कर पाना संभव नहीं है, संभवतः श्रीकृष्ण स्तुति में इस पृथ्वी पर लिखा गया यह सबसे मधुर अष्टक है।

श्रीवल्लभाचार्यजी (1479-1531) भक्तिकालीन सगुणधारा की कृष्णभक्ति शाखा के आधारस्तंभ एवं पुष्टिमार्ग के प्रणेता थे। उनका प्रादुर्भाव विक्रम संवत् 1535, वैशाख कृष्ण एकादशी को दक्षिण भारत के कांकरवाड ग्रामवासी तैलंग ब्राह्मण श्रीलक्ष्मणभट्टजी की पत्नी इलम्मागारू के गर्भ से हुआ। यह स्थान वर्तमान छत्तीसगढ़ राज्य के रायपुर के निकट चम्पारण्य है। उन्हें वैश्वानरावतार (अग्नि का अवतार) कहा गया है। वे वेदशास्त्र में पारंगत थे। वर्तमान में इसे वल्लभसम्प्रदाय या पुष्टिमार्ग सम्प्रदाय के नाम से जाना जाता है। और वल्लभसम्प्रदाय वैष्णव सम्प्रदाय अन्तर्गत आते हैं।  wikipedia

इस छोटी-सी स्तुति में मुरली मनोहर की अत्यंत मनमोहक छवि तो उभरती ही है, साथ ही उनके सर्वव्यापी और संसार के पालनकर्ता होने का भी भान होता है ।

‘मधुराष्टकम्’ के साथ आगे उसका अर्थ भी दिया गया है ।

अधरं मधुरं वदनं मधुरं,
नयनं मधुरं हसितं मधुरम्।
हृदयं मधुरं गमनं मधुरं,
मधुराधिपतेरखिलं मधुरम् ।। 1।।
(मधुराधिपते अखिलं मधुरम्)

अधरं मधुरं – श्री कृष्ण के होंठ मधुर हैं
वदनं मधुरं – मुख मधुर है
नयनं मधुरं – नेत्र (ऑंखें) मधुर हैं
हसितं मधुरम् – मुस्कान मधुर है
हृदयं मधुरं – हृदय मधुर है
गमनं मधुरं – चाल भी मधुर है
मधुराधिपते – मधुराधिपति (मधुरता के ईश्वर श्रीकृष्ण)
अखिलं मधुरम् – सभी प्रकार से मधुर है

वचनं मधुरं चरितं मधुरं,
वसनं मधुरं वलितं मधुरम्।
चलितं मधुरं भ्रमितं मधुरं,
मधुराधिपतेरखिलं मधुरम् ।। 2।।
(मधुराधिपते अखिलं मधुरम्)

वचनं मधुरं – भगवान श्रीकृष्ण के वचन (बोलना) मधुर है
चरितं मधुरं – चरित्र मधुर है
वसनं मधुरं – वस्त्र मधुर हैं
वलितं मधुरम् – वलय, कंगन मधुर हैं
चलितं मधुरं – चलना मधुर है
भ्रमितं मधुरं – भ्रमण (घूमना) मधुर है
मधुराधिपते – मधुरता के ईश्वर श्रीकृष्ण (मधुराधिपति)
अखिलं मधुरम् – आप (आपका) सभी प्रकार से मधुर है

वेणुर्मधुरो रेणुर्मधुरः,
पाणिर्मधुरः पादौ मधुरौ।
नृत्यं मधुरं सख्यं मधुरं,
मधुराधिपतेरखिलं मधुरम् ।। 3।।

वेणुर्मधुरो – श्री कृष्ण की वेणु मधुर है, बांसुरी मधुर है
रेणुर्मधुरः – चरणरज मधुर है, उनको चढ़ाये हुए फूल मधुर हैं
पाणिर्मधुरः – हाथ (करकमल) मधुर हैं
पादौ मधुरौ – चरण मधुर हैं
नृत्यं मधुरं – नृत्य मधुर है
सख्यं मधुरं – मित्रता मधुर है
मधुराधिपते – हे श्रीकृष्ण (मधुराधिपति)
अखिलं मधुरम् – आप (आपका) सभी प्रकार से मधुर है

गीतं मधुरं पीतं मधुरं,
भुक्तं मधुरं सुप्तं मधुरम्।
रूपं मधुरं तिलकं मधुरं,
मधुराधिपतेरखिलं मधुरम् ।। 4।।

गीतं मधुरं – श्री कृष्ण के गीत मधुर हैं
पीतं मधुरं – पीताम्बर मधुर है
भुक्तं मधुरं – भोजन (खाना) मधुर है
सुप्तं मधुरम् – शयन (सोना) मधुर है
रूपं मधुरं – रूप मधुर है
तिलकं मधुरं – तिलक (टीका) मधुर है
मधुराधिपते – हे भगवान् कृष्ण (मधुराधिपति)
अखिलं मधुरम् – आप (आपका) सभी प्रकार से मधुर है

करणं मधुरं तरणं मधुरं,
हरणं मधुरं रमणं मधुरम्।
वमितं मधुरं शमितं मधुरं,
मधुराधिपतेरखिलं मधुरम् ।। 5।।

करणं मधुरं – कार्य मधुर हैं
तरणं मधुरं – तारना मधुर है (दुखो से तारना, उद्धार करना)
हरणं मधुरं – हरण मधुर है (दुःख हरण)
रमणं मधुरम् – रमण मधुर है
वमितं मधुरं – उद्धार मधुर हैं
शमितं मधुरं – शांत रहना मधुर है
मधुराधिपते – हे भगवान् कृष्ण (मधुराधिपति)
अखिलं मधुरम् – आप (आपका) सभी प्रकार से मधुर है

गुंजा मधुरा माला मधुरा,
यमुना मधुरा वीची मधुरा।
सलिलं मधुरं कमलं मधुरं,
मधुराधिपतेरखिलं मधुरम् ।। 6।।

गुंजा मधुरा – गर्दन मधुर है
माला मधुरा – माला भी मधुर है
यमुना मधुरा – यमुना मधुर है
वीची मधुरा – यमुना की लहरें मधुर हैं
सलिलं मधुरं – यमुना का पानी मधुर है
कमलं मधुरं – यमुना के कमल मधुर हैं
मधुराधिपते – हे भगवान् कृष्ण (मधुराधिपति)
अखिलं मधुरम् – आप (आपका) सभी प्रकार से मधुर है

गोपी मधुरा लीला मधुरा,
युक्तं मधुरं मुक्तं मधुरम्।
दृष्टं मधुरं शिष्टं मधुरं,
मधुराधिपतेरखिलं मधुरम् ।। 7।।

गोपी मधुरा – गोपियाँ मधुर हैं
लीला मधुरा – कृष्ण की लीला मधुर है
युक्तं मधुरं – उनक सयोग मधुर है
मुक्तं मधुरम् – वियोग मधुर है
दृष्टं मधुरं – निरिक्षण (देखना) मधुर है
शिष्टं मधुरं – शिष्टाचार (शिष्टता) भी मधुर है
मधुराधिपते – हे भगवान् कृष्ण (मधुराधिपति)
अखिलं मधुरम् – आप (आपका) सभी प्रकार से मधुर है

गोपा मधुरा गावो मधुरा,
यष्टिर्मधुरा सृष्टिर्मधुरा।
दलितं मधुरं फलितं मधुरं,
मधुराधिपतेरखिलं मधुरम् ।। 8।।

गोपा मधुरा – गोप मधुर हैं
गावो मधुरा – गायें मधुर हैं
यष्टिर्मधुरा – लकुटी (छड़ी) मधुर है
सृष्टिर्मधुरा – सृष्टि (रचना) मधुर है
दलितं मधुरं – दलन (विनाश करना) मधुर है
फलितं मधुरं – फल देना (वर देना) मधुर है
मधुराधिपते – हे भगवान् कृष्ण (मधुराधिपति)
अखिलं मधुरम् – आप (आपका) सभी प्रकार से मधुर है ।। 8।।

स्वामी वल्लभाचार्य जी की भावपूर्ण रचना और पंडित जसराज जी की अदभुत गायकी साक्षात भगवान श्रीकृष्ण की रूप माधुरी का दर्शन करा देती है। जितना सुनो उतना ही सुनने की लालसा बढ़ती जाती है।

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