रामाज्ञा प्रश्न / षष्ठम सर्ग / सप्तक 6 / श्लोक 1
रामाज्ञा प्रश्न षष्ठम सर्ग सप्तक 6 श्लोक 1 — रामराज्य में सब धर्मनिरत, राग-रोष-दोष रहित और चारों पदार्थ सुलभ; श्रेष्ठ प्रश्न-फल।
इस ग्रंथ में उत्तर सीधा नहीं, प्रसंग के माध्यम से मिलता है — जो प्रसंग सामने आए, उसी का भाव प्रश्न का फल बन जाता है। इस छठे सप्तक के पहला दोहे में षष्ठम सर्ग का वह भाव है जहाँ हर्ष के साथ-साथ वियोग की छाया भी दिखाई देती है।
रामराज्य में सब धर्मनिरत और सुखी — यह प्रश्न-फल श्रेष्ठ है।
मूल दोहा: राम राज राजत सकल धरम निरत नर नारि। राग न रोष न दोष दुख, सुलभ पदारथ चारि॥१॥
शब्दार्थ:
- राजत = शोभित हैं
- धरम निरत = धर्माचरण में लगे हुए
- नर नारि = स्त्री-पुरुष
- राग = भोगासक्ति
- रोष = क्रोध
- दोष = काम आदि दोष
- सुलभ = सहज प्राप्त
- पदारथ चारि = चारों पदार्थ — धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष
राम राज राजत सकल धरम निरत नर नारि = रामराज्य में सभी स्त्री-पुरुष धर्माचरण में लगे शोभित हैं। राग न रोष न दोष दुख, सुलभ पदारथ चारि = राग, क्रोध, दोष और दुःख नहीं, चारों पदार्थ सुलभ हैं।
भावार्थ / व्याख्या:
श्रीराम के राज्य में सभी स्त्री-पुरुष धर्माचरण में लगे हुए शोभित हैं। वहाँ राग अर्थात् भोगासक्ति, क्रोध, दोष और दुःख किसी को नहीं है और सबको चारों पदार्थ — धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष — सुलभ हैं।
यह आदर्श समाज का चित्र है, जहाँ भौतिक समृद्धि और आंतरिक शुद्धि दोनों साथ हैं।
तुलसीदास जी इस प्रश्न-फल को ‘श्रेष्ठ’ कहते हैं। शकुन की दृष्टि से यह दोहा उन प्रश्नों में सर्वाधिक अनुकूल है जहाँ जीवन के सर्वांगीण संतुलन की बात हो। चारों पुरुषार्थों की एक साथ प्राप्ति दुर्लभ योग है।
शकुन फल:
यह प्रश्न-फल श्रेष्ठ है और चारों पुरुषार्थों की प्राप्ति का सूचक है। निम्नलिखित प्रश्नों में:
- धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष — चारों की प्राप्ति
- जीवन में सर्वांगीण संतुलन
- क्रोध, आसक्ति या दोष से मुक्ति
- समाज या संस्था में शांति और अनुशासन
- सुख के साथ आंतरिक शुद्धि
इस दोहे के आने पर प्रश्न-फल श्रेष्ठ है। चारों पदार्थ सुलभ होंगे — भौतिक समृद्धि और आंतरिक शांति दोनों मिलेंगी।
आस्था और भक्ति के हमारे मिशन का समर्थन करेंहर सहयोग, चाहे बड़ा हो या छोटा, फर्क डालता है! आपका सहयोग हमें इस मंच को बनाए रखने और पौराणिक कहानियों को अधिक लोगो तक फैलाने में मदद करता है। सहयोग करें |
टिप्पणियाँ बंद हैं।