रामाज्ञा प्रश्न / षष्ठम सर्ग / सप्तक 4 / श्लोक 4
रामाज्ञा प्रश्न षष्ठम सर्ग सप्तक 4 श्लोक 4 — चित्त का चकोर बनकर राम-मुख चन्द्रमा का ध्यान; वही समय सुहावना, श्रेष्ठ प्रश्न-फल।
सात सर्ग, प्रत्येक सर्ग में सात सप्तक और प्रत्येक सप्तक में सात दोहे — यही ॥रामाज्ञा प्रश्न॥ की सरल किंतु सुगठित संरचना है। यह दोहा षष्ठम सर्ग के चौथे सप्तक में क्रम से चौथा है — यहाँ प्रेम, धर्म और मर्यादा के भाव प्रमुख हैं।
चित्त का चकोर बनना — यह प्रश्न-फल श्रेष्ठ है।
मूल दोहा: रामचन्द्र मुख चंद्रमा चित चकोर जब होइ। राम राज सब काज सुभ समउ सुहावन सोइ॥४॥
शब्दार्थ:
- मुख चंद्रमा = मुख रूपी चन्द्रमा
- चित = चित्त
- चकोर = चकोर पक्षी
- जब होइ = जब बन जाए
- सब काज सुभ = सभी कार्य शुभ
- समउ = समय
- सुहावन = सुहावना, मंगलकारी
रामचन्द्र मुख चंद्रमा चित चकोर जब होइ = चित्त जब चकोर के समान राम-मुख रूपी चन्द्रमा का ध्यान करने लगे। समउ सुहावन सोइ = वही समय सुहावना है।
भावार्थ / व्याख्या:
चित्त जब चकोर के समान श्रीरामचंद्रजी के मुख रूपी चन्द्रमा का ध्यान करने वाला बन जाता है, तब वही समय सुहावना और मंगलकारी है। रामराज्य तो सभी कार्यों के लिए शुभ है ही।
चकोर की विशेषता यह है कि वह केवल चन्द्रमा को देखता है और उसी से तृप्त होता है। यह एकनिष्ठ ध्यान का प्रतीक है।
इस दोहे का गहरा संदेश यह है कि शुभ मुहूर्त बाहर नहीं, भीतर होता है। जब मन एकाग्र और शुद्ध हो, वही सबसे शुभ समय है। तुलसीदास जी इस प्रश्न-फल को ‘श्रेष्ठ’ कहते हैं।
शकुन फल:
यह प्रश्न-फल श्रेष्ठ है। निम्नलिखित प्रश्नों में परिणाम अत्यंत अनुकूल:
- शुभ समय या मुहूर्त का प्रश्न
- मन की एकाग्रता और ध्यान
- किसी लक्ष्य पर एकनिष्ठ ध्यान
- भक्ति और साधना की गहराई
- कोई भी कार्य जिसमें मन लगाना आवश्यक हो
इस दोहे के आने पर प्रश्न-फल श्रेष्ठ है। मुहूर्त बाहर मत खोजें — जब मन एकाग्र हो, वही सबसे शुभ समय है।
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