रामाज्ञा प्रश्न / षष्ठम सर्ग / सप्तक 2 / श्लोक 4
रामाज्ञा प्रश्न षष्ठम सर्ग सप्तक 2 श्लोक 4 — माताओं से मिलन और सबका सम्मान; प्रियजन के मिलन-वियोग से हर्ष और दुःख का शकुन।
सात सर्ग, प्रत्येक सर्ग में सात सप्तक और प्रत्येक सप्तक में सात दोहे — यही ॥रामाज्ञा प्रश्न॥ की सरल किंतु सुगठित संरचना है। प्रस्तुत दोहा षष्ठम सर्ग के दूसरे सप्तक में चौथा स्थान पर है, जहाँ पुनर्मिलन और कुशल-क्षेम के शुभ संकेत मिलते हैं।
माताओं से मिलन और सबका सम्मान — हर्ष और वियोग दोनों का सूचक।
मूल दोहा: मिली मातु हित गुरु सनमाने सब लोग। सगुन समय बिसमय हरष प्रिय संजोग बियोग॥४॥
शब्दार्थ:
- मिली मातु = माताएँ मिलीं
- हित = हितैषी, मित्र
- गुरु = गुरुदेव
- सनमाने = सम्मान किया
- सगुन समय = इस समय का शकुन
- बिसमय = आश्चर्य, विषाद
- हरष = हर्ष
- प्रिय संजोग बियोग = प्रियजन का मिलन और वियोग
मिली मातु हित गुरु, सनमाने सब लोग = माताएँ मिलीं, प्रभु ने हितैषियों और गुरुदेव सबका सम्मान किया। प्रिय संजोग बियोग = प्रियजन के मिलन और वियोग का सूचक।
भावार्थ / व्याख्या:
माताएँ प्रेम से मिलीं और प्रभु ने हितैषियों, मित्रों तथा गुरुदेव — सभी लोगों का सम्मान किया।
तुलसीदास जी कहते हैं कि यह शकुन प्रियजन के मिलन एवं वियोग से होने वाले हर्ष एवं दुःख का सूचक है।
यह मिश्रित शकुन है — माताओं से मिलन का हर्ष, पर पिता के वियोग का दुःख। शकुन की दृष्टि से यह दोहा बताता है कि आने वाले समय में दोनों तरह की भावनाएँ मिलेंगी। किसी से मिलन होगा और किसी की कमी खलेगी। मन को दोनों के लिए तैयार रखें।
शकुन फल:
यह शकुन मिलन और वियोग दोनों का सूचक है। निम्नलिखित प्रश्नों में:
- किसी से मिलन के साथ किसी की कमी
- मिश्रित भावनाओं वाला अवसर
- परिवार में एक साथ हर्ष और शोक
- बड़ों से मिलना और उनका सम्मान
- सुख के बीच आने वाली पुरानी याद
इस दोहे के आने पर हर्ष और वियोग दोनों का संकेत है। जो मिल रहे हैं उनका सम्मान करें और जो नहीं हैं उनकी स्मृति संजोएँ।
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