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रामाज्ञा प्रश्न / षष्ठम सर्ग / सप्तक 2 / श्लोक 2

रामाज्ञा प्रश्न षष्ठम सर्ग सप्तक 2 श्लोक 2 — शत्रु को जीतकर अयोध्या वापसी और भरत मिलाप; यह प्रश्न-फल श्रेष्ठ है।

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॥रामाज्ञा प्रश्न॥ तुलसीदास जी की उन रचनाओं में गिना जाता है जो भक्ति के साथ-साथ व्यावहारिक मार्गदर्शन भी देती हैं। प्रस्तुत दोहा षष्ठम सर्ग के दूसरे सप्तक में दूसरा स्थान पर है, जहाँ पुनर्मिलन और कुशल-क्षेम के शुभ संकेत मिलते हैं।

भरत मिलाप — यह प्रश्न-फल श्रेष्ठ है।

मूल दोहा: मिले गुरुहि जन परिजनहि, भेंटत भरत सप्रीति। लखन राम सिय कुसल पुर आए रिपु रन जीति॥२॥

शब्दार्थ:

  • मिले गुरुहि = गुरुदेव से मिले
  • जन परिजनहि = सेवकों और संबंधियों से
  • भेंटत = गले लगकर मिलते हैं
  • सप्रीति = प्रेमपूर्वक
  • कुसल = कुशलपूर्वक
  • पुर आए = नगर लौट आए
  • रिपु रन जीति = शत्रु को युद्ध में जीतकर

मिले गुरुहि जन परिजनहि, भेंटत भरत सप्रीति = गुरुदेव, नगरवासियों और संबंधियों से मिले, भरतजी से प्रेमपूर्वक गले लगे। आए रिपु रन जीति = शत्रु को युद्ध में जीतकर लौटे।

भावार्थ / व्याख्या:

शत्रु को युद्ध में जीतकर श्रीराम, जानकीजी और लक्ष्मणजी कुशलपूर्वक अयोध्या लौट आए। वहाँ गुरुदेव से, नगर के लोगों से तथा सेवक-संबंधियों से मिलकर बड़े प्रेम से प्रभु भरतजी से गले लगकर मिले।

भरत मिलाप रामकथा का सबसे भावुक प्रसंग माना जाता है। चौदह वर्ष तक भरतजी नंदिग्राम में तपस्वी की तरह रहे थे।

तुलसीदास जी इस प्रश्न-फल को ‘श्रेष्ठ’ कहते हैं। शकुन की दृष्टि से यह दोहा उन प्रश्नों में सर्वाधिक अनुकूल है जहाँ विजय के साथ सकुशल वापसी और अपनों से मिलन विषय हो।

शकुन फल:

यह प्रश्न-फल श्रेष्ठ है। निम्नलिखित प्रश्नों में परिणाम अत्यंत अनुकूल:

  • शत्रु या विरोधी पर विजय के बाद वापसी
  • भाई-बहनों और परिवार से मिलन
  • गुरु और बड़ों से भेंट
  • लंबे संघर्ष का सुखद अंत
  • परिवार में एकता और प्रेम की वापसी

इस दोहे के आने पर प्रश्न-फल श्रेष्ठ है। विजय भी मिलेगी और अपनों से मिलन भी। संघर्ष का सुखद अंत होगा।

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