रामाज्ञा प्रश्न / षष्ठम सर्ग / सप्तक 1 / श्लोक 7
रामाज्ञा प्रश्न षष्ठम सर्ग सप्तक 1 श्लोक 7 — तुलसीदास जी का हाथ जोड़कर जानकीनाथ की जय-जयकार; शुभ मंगलकारी शकुन।
प्रश्न पूछने की परंपरा में मन को एकाग्र कर, श्रीराम का स्मरण करते हुए सर्ग, सप्तक और दोहा — तीनों संख्याएँ चुनी जाती हैं। यह पहले सप्तक का सातवाँ दोहा है। षष्ठम सर्ग विजय के पश्चात अयोध्या-वापसी और राज्याभिषेक के प्रसंगों का सर्ग है।
सप्तक का समापन — जानकीनाथ की जय, शुभ मंगलकारी शकुन।
मूल दोहा: तुलसी मंगल सगुन सुभ कहत जोरि जुग हाथ। हंस बंस अवतंस जय जय जय जानकि नाथ॥७॥
शब्दार्थ:
- कहत = कहते हैं
- जोरि जुग हाथ = दोनों हाथ जोड़कर
- हंस बंस = सूर्यवंश
- अवतंस = विभूषण, शिरोमणि
- जय जय जय = जय हो, जय हो
- जानकि नाथ = जानकीनाथ (श्रीराम)
तुलसी मंगल सगुन सुभ कहत जोरि जुग हाथ = तुलसीदास दोनों हाथ जोड़कर कहते हैं, यह शुभ मंगलकारी शकुन है। जय जय जय जानकि नाथ = जानकीनाथ की जय हो।
भावार्थ / व्याख्या:
तुलसीदास दोनों हाथ जोड़कर कहते हैं — ‘सूर्यवंश विभूषण श्रीजानकीनाथ की जय हो, जय हो, जय हो!’ यह शुभ शकुन मंगलकारी है।
ध्यान देने योग्य है कि तुलसीदास जी यहाँ ‘रामनाथ’ नहीं, ‘जानकीनाथ’ कहते हैं — अर्थात् श्रीराम को सीताजी के संबंध से पुकारते हैं। यह उनकी भक्ति की विशेषता है।
शकुन की दृष्टि से यह दोहा शुभ और मंगलकारी है। जय-जयकार तीन बार दोहराई गई है, जो पूर्णता और निश्चय का सूचक है। यह सभी प्रकार के प्रश्नों में अनुकूल उत्तर देता है।
शकुन फल:
यह शुभ शकुन मंगलकारी है। निम्नलिखित सभी प्रश्नों में अनुकूल:
- कोई भी कार्य या निर्णय
- विजय, सफलता और जयकार का अवसर
- किसी शुभ कार्य का समापन
- भक्ति, प्रार्थना और श्रद्धा का फल
- विनम्रता से माँगी गई किसी वस्तु की प्राप्ति
इस दोहे के आने पर शकुन शुभ और मंगलकारी है। हाथ जोड़कर श्रद्धा से जो माँगेंगे, वह मिलेगा।
आस्था और भक्ति के हमारे मिशन का समर्थन करेंहर सहयोग, चाहे बड़ा हो या छोटा, फर्क डालता है! आपका सहयोग हमें इस मंच को बनाए रखने और पौराणिक कहानियों को अधिक लोगो तक फैलाने में मदद करता है। सहयोग करें |
टिप्पणियाँ बंद हैं।