रामाज्ञा प्रश्न / पंचम सर्ग / सप्तक 5 / श्लोक 3
रामाज्ञा प्रश्न पंचम सर्ग सप्तक 5 श्लोक 3 — हनुमानजी का लौटकर सीताजी की कुशलता का समाचार देना और जयकार; कार्य की सफल परिणति।
शकुन-विचार के लिए भक्तजन सदियों से ॥रामाज्ञा प्रश्न॥ का सहारा लेते आए हैं — श्रद्धापूर्वक चुनी गई संख्या ही उत्तर तक पहुँचाती है। पंचम सर्ग के पाँचवें सप्तक का तीसरा दोहा प्रस्तुत है, जिसमें युद्ध, विजय और शत्रु-पराजय के संकेत छिपे हैं।
सीताजी की कुशलता का समाचार और जयकार — कार्य की सफल परिणति।
मूल दोहा: पूँछ बुताइ प्रबोधि सिय आइ गहे प्रभु पाइ। खेम कुसल जय जानकी जय जय जय रघुराइ॥३॥
शब्दार्थ:
- पूँछ बुताइ = पूँछ बुझाकर
- प्रबोधि = आश्वासन देकर
- आइ = लौटकर
- गहे प्रभु पाइ = प्रभु के चरण पकड़े
- खेम कुसल = सकुशल हैं
- जय जानकी = जानकीजी की जय
- जय रघुराइ = रघुनाथजी की जय
पूँछ बुताइ प्रबोधि सिय आइ गहे प्रभु पाइ = पूँछ बुझाकर, सीताजी को आश्वासन देकर लौटकर प्रभु के चरण पकड़े। खेम कुसल जय जानकी = जानकीजी सकुशल हैं, उनकी जय हो।
भावार्थ / व्याख्या:
पूँछ बुझाकर, श्रीजानकीजी को आश्वासन देकर, लौटकर हनुमानजी ने प्रभु श्रीरामजी के चरण पकड़कर कहा — ‘श्रीजानकीजी जीवित हैं और कुशल से हैं, उनकी जय हो! श्रीरघुनाथजी की जय हो, जय हो, जय हो!’
यह पूरे सुंदरकांड की परिणति है। जिस समाचार के लिए महीनों की खोज हुई, वह अंततः मिला।
शकुन की दृष्टि से यह दोहा एक बड़े कार्य की सफल परिणति और प्रतीक्षित कुशल समाचार का सूचक है। ध्यान देने योग्य है कि हनुमानजी ने पहले प्रभु के चरण पकड़े, फिर समाचार दिया — सफलता का श्रेय स्वयं नहीं लिया।
शकुन फल:
यह शकुन कार्य की सफल परिणति और कुशल समाचार का सूचक है। निम्नलिखित प्रश्नों में:
- लंबी खोज या प्रयत्न की सफल परिणति
- किसी की कुशलता का प्रतीक्षित समाचार
- सौंपे गए कार्य को पूरा करके लौटना
- विनम्रता के साथ सफलता की सूचना देना
- बड़े संकट के बाद मिलने वाली राहत
इस दोहे के आने पर प्रतीक्षित कुशल समाचार और कार्य की सफल परिणति का संकेत है। सफलता का श्रेय बाँटें — जैसे हनुमानजी ने प्रभु के चरणों में रखा।
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