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विश्वकर्मा पूजा – तिथि और पूजन विधि

बुधवार, 16 सितंबर 2020

चतुर्दशी तिथि आरंभ (15 सितंबर)- 11 बजकर 1 मिनट से।
चतुर्दशी तिथि समाप्त (16 सितंबर)- 7 बजकर 56 मिनट तक।
पूजा का शुभ मुहूर्त- 16 सितंबर- सुबह 10 बजकर 9 मिनट से 11 बजकर 37 मिनट तक।

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हिन्दू धर्म में विश्वकर्मा को निर्माण एवं सृजन का देवता माना जाता है। भगवान विश्वकर्मा को वास्तु शास्त्र का जनक भी कहा जाता है।

एक कथा के अनुसार संसार की रचना शुरुआत में भगवान विष्णु क्षीरसागर में प्रकट हुए और विष्णु जी के नाभि कमल से ब्रह्माजी की उत्पत्ति हुई ब्रह्मा जी के पुत्र का नाम धर्म रखा गया । धर्म का विवाह संस्कार वस्तु नाम की स्त्री से हुआ। धर्म और वस्तु के 7 पुत्र हुए उनके सातवें पुत्र का नाम वास्तु रखा गया वास्तु शिल्प शास्त्र में निपुण था वास्तु शास्त्र में महारत होने के कारण विश्वकर्मा को वास्तु शास्त्र का जनक कहा गया इस तरह भगवान विश्वकर्मा जी का जन्म हुआ। अश्विन मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी तिथि को ऋषि विश्वकर्मा की पूजा की जाती है। माना जाता है कि इस दिन ही भगवान विश्वकर्मा का जन्म हुआ था।

विश्वकर्मा जी को महान शिल्पकार कहते हैं। ऐसी मान्यता है कि विश्वकर्मा जी ने इंद्रपुरी द्वारिका हस्तिनापुर लंका स्वर्ग लोक आदि का निर्माण किया थ। भगवान विष्णु का सुदर्शन चक्र और भगवान शिव का त्रिशूल भी ऋषि विश्वकर्मा ने ही बनाया था। कहते हैं कि उन्होंने कईं देवी-देवताओं के लिए अस्त्र-शस्त्र और घर-नगर आदि का निर्माण किया था। पुराणों में बताया गया है कि हस्तिनापुर, द्वारिका, इंद्रपुरी और पुष्पक विमान भी विश्वकर्मा जी ने ही बनाए थे। माना जाता है कि भगवान शिव के लिए लंका में सोने के महल का निर्माण भी विश्वकर्मा जी ने ही किया था। जिसे लालच की वजह से लंकापति रावण ने महल की पूजा करने की दक्षिणा के रूप में ले लिया था।

विश्कर्मा इतने बड़े शिल्पकार थे कि उन्होंने जल पर चलने योग्य दो खड़ाऊ भी तैयार की थ।

विश्वकर्मा जयंती के दिन प्रतिष्ठान के अवतारों सभी औजार मशीन एवं अन्य उपकरण को साफ करके उनका तिलक करते हैं साथि ही उन पर फूल भी चढ़ाते हैं हवन के बाद सभी भक्तों में प्रसाद का वितरण करते हैं

यह पूजा उन लोगों के लिए महत्वपूर्ण है जो कलाकार, शिल्पकार और व्यापारी हैं। ऐसी मान्यता है कि भगवान विश्वकर्मा की पूजा करने से व्यापार में वृद्धि होती है। धन-धान्य और सुख-समृद्धि की अभिलाषा रखने वालों के लिए भगवान विश्वकर्मा की पूजा करना आवश्यक और मंगलदायी है।

विश्वकर्मा पूजा का शुभ मुहूर्त-

चतुर्दशी तिथि आरंभ (15 सितंबर)- 11 बजकर 1 मिनट से।
चतुर्दशी तिथि समाप्त (16 सितंबर)- 7 बजकर 56 मिनट तक।
पूजा का शुभ मुहूर्त- 16 सितंबर- सुबह 10 बजकर 9 मिनट से 11 बजकर 37 मिनट तक।

भगवान विश्वकर्मा की पूजा का मंत्र

भगवान विश्वकर्मा की पूजा में ‘ॐ आधार शक्तपे नम: और ॐ कूमयि नम:’, ‘ॐ अनन्तम नम:’, ‘पृथिव्यै नम:’ मंत्र का जप करना चाहिए। जप करते समय साथ में रुद्राक्ष की माला रखें।

विश्वकर्मा पूजन विधि

विश्वकर्मा जयंती के दिन प्रतिमा को विराजित करके पूजा की जाती है जिस व्यक्ति के प्रतिष्ठान में पूजा होनी है वह प्रातः काल स्नान आदि करने के बाद अपनी पत्नी के साथ पूजन करें हाथ में फूल चावल लेकर भगवान विश्वकर्मा का ध्यान करते हुए घर और प्रतिष्ठान में फूल और चावल छिड़कने चाहिए इसके बाद पूजन कराने वाले व्यक्ति को पत्नी के साथ यज्ञ में आहुति देनी चाहिए पूजा करते समय धूप पुष्प का प्रयोग करना चाहिए इसके अगले दिन प्रतिमा के विसर्जन करने का विधान हैं।

  • भगवान विश्वकर्मा जी की पूजा के लिए आवश्यक सामग्री जैसे अक्षत, फूल, चंदन, धूप, अगरबत्ती, दही, रोली, सुपारी,रक्षा सूत्र, मिठाई, फल आदि की व्यवस्था कर लें।
  • इसके बाद फैक्ट्री, वर्कशॉप, दुकान आदि के स्वामी को स्नान करके सपत्नीक पूजा के आसन पर बैठना चाहिए।
  • कलश को अष्टदल की बनी रंगोली पर रखें।
  • फिर विधि-विधान से क्रमानुसार स्वयं या फिर अपने पंडितजी के माध्यम से पूजा करें।
  • ध्यान रहे कि पूजा में किसी भी प्रकार की शीघ्रता भूलकर न करें।

भगवान विश्वकर्मा जी आरती

vishwakarma-puja Celebration in any Factoryजय श्री विश्वकर्मा प्रभु,
जय श्री विश्वकर्मा ।
सकल सृष्टि के करता,
रक्षक स्तुति धर्मा ॥

आदि सृष्टि मे विधि को,
श्रुति उपदेश दिया ।
जीव मात्र का जग मे,
ज्ञान विकास किया ॥

जय श्री विश्वकर्मा प्रभु,
जय श्री विश्वकर्मा ।

ध्यान किया जब प्रभु का,
सकल सिद्धि आई ।
ऋषि अंगीरा तप से,
शांति नहीं पाई ॥

जय श्री विश्वकर्मा प्रभु,
जय श्री विश्वकर्मा ।

रोग ग्रस्त राजा ने,
जब आश्रय लीना ।
संकट मोचन बनकर,
दूर दुःखा कीना ॥

जय श्री विश्वकर्मा प्रभु,
जय श्री विश्वकर्मा ।

जब रथकार दंपति,
तुम्हारी टेर करी ।
सुनकर दीन प्रार्थना,
विपत हरी सगरी ॥

जय श्री विश्वकर्मा प्रभु,
जय श्री विश्वकर्मा ।

एकानन चतुरानन,
पंचानन राजे।
त्रिभुज चतुर्भुज दशभुज,
सकल रूप साजे ॥

जय श्री विश्वकर्मा प्रभु,
जय श्री विश्वकर्मा ।

ध्यान धरे तब पद का,
सकल सिद्धि आवे ।
मन द्विविधा मिट जावे,
अटल शक्ति पावे ॥

जय श्री विश्वकर्मा प्रभु,
जय श्री विश्वकर्मा ।

श्री विश्वकर्मा की आरती,
जो कोई गावे ।
भजत गजानांद स्वामी,
सुख संपाति पावे ॥

जय श्री विश्वकर्मा प्रभु,
जय श्री विश्वकर्मा ।
सकल सृष्टि के करता,
रक्षक स्तुति धर्मा॥

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