रामाज्ञा प्रश्न / द्वितीय सर्ग / सप्तक 3 / श्लोक 4
रामाज्ञा प्रश्न द्वितीय सर्ग सप्तक 3 श्लोक 4 — सुमंत्रजी की वापसी पर घोड़ों का मुड़-मुड़कर हिनहिनाना; प्रिय-वियोग और शोक का शकुन।
इस ग्रंथ की विशेषता यह है कि प्रत्येक दोहा रामकथा का एक प्रसंग भी है और प्रश्न का फल भी। द्वितीय सर्ग के तीसरे सप्तक का यह चौथा दोहा है; इस सर्ग में कैकेयी और मंथरा के प्रसंग होने से कई दोहे चेतावनी देते हैं।
सुमंत्रजी की वापसी और घोड़ों का हिनहिनाना — वियोग और शोक का शकुन।
मूल दोहा: हय हाँके फिरी दखिन दिसि हेरि हेरि हिहिनात। भये निषाद बिषाद बस अवध सुमंतहि जात॥४॥
शब्दार्थ:
- हय = घोड़े
- हाँके = हाँके, चलाए
- फिरी दखिन दिसि = दक्षिण दिशा की ओर मुड़कर
- हेरि हेरि = बार-बार देख-देखकर
- हिहिनात = हिनहिनाते हैं
- निषाद = निषादगण
- बिषाद बस = शोक के वश
- सुमंतहि = सुमंत्रजी को
हेरि हेरि हिहिनात = बार-बार मुड़कर देखते और हिनहिनाते हैं। भये निषाद बिषाद बस = निषादगण भी शोक-संतप्त हो गए।
भावार्थ / व्याख्या:
सुमंत्रजी ने अयोध्या लौटते समय घोड़ों को हाँका, परंतु वे बार-बार दक्षिण दिशा की ओर — जिधर श्रीराम गए थे — मुड़-मुड़कर देखते और हिनहिनाते रहे। यह देखकर निषादगण भी शोक-संतप्त हो गए।
यह रामायण के सबसे मार्मिक दृश्यों में से एक है। मनुष्य तो दूर, पशु भी वियोग सह नहीं पा रहे थे।
शकुन की दृष्टि से यह दोहा प्रिय-वियोग और शोक का सूचक है। यह संकेत देता है कि किसी प्रिय से बिछड़ने या दूरी बढ़ने की स्थिति बन सकती है। ऐसे समय में मन को सँभालना और अपनों के संपर्क में बने रहना आवश्यक है।
शकुन फल:
यह शकुन प्रिय-वियोग और शोक का सूचक है। निम्नलिखित प्रश्नों में सावधानी:
- किसी प्रिय व्यक्ति से बिछड़ना या दूर जाना
- परिवार से लंबी दूरी या अलगाव
- लौटने या वापसी से जुड़े प्रश्न
- किसी के जाने से उत्पन्न शोक की स्थिति
- संबंध टूटने या दूरी बढ़ने की आशंका
इस दोहे के आने पर वियोग और शोक की सूचना मिलती है। अपनों से संपर्क बनाए रखें और इस समय कोई ऐसा निर्णय न लें जिससे दूरी और बढ़े।
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