रामाज्ञा प्रश्न / सप्तम सर्ग / सप्तक 6 / श्लोक 3
रामाज्ञा प्रश्न सप्तम सर्ग सप्तक 6 श्लोक 3 — रामराज्य में देवकृत बाधा; दोष देखकर उचित उपाय करने का निर्देश देने वाला शकुन।
शकुन शुभ है या अशुभ — यह निर्णय ॥रामाज्ञा प्रश्न॥ में उसी प्रसंग से होता है जो चुने हुए दोहे में वर्णित है। इस छठे सप्तक के तीसरा दोहे में सप्तम सर्ग का वह भाव है जो कहता है — प्रश्न के अनुरूप आया दोहा ही सत्य उत्तर है।
देवकृत बाधा — दोष देखकर उचित उपाय करो।
मूल दोहा: राम राज बाधक बिबुध, कहब सगुन सति भाउ। देखि देवकृत दोष दुख, कीजिय उचित उपाउ॥३॥
शब्दार्थ:
- राम राज बाधक = रामराज्य में बाधा डालने वाले
- बिबुध = देवता
- कहब = कहना चाहिए
- सति भाउ = सत्य भाव से
- देखि = देखकर
- देवकृत = देवताओं द्वारा किया गया
- दोष दुख = दोष और दुःख
- कीजिय उचित उपाउ = उचित उपाय करो
राम राज बाधक बिबुध, कहब सगुन सति भाउ = रामराज्य में बाधक देवता ही थे — यह शकुन सत्य भाव से कहना चाहिए। देखि देवकृत दोष दुख, कीजिय उचित उपाउ = देवकृत दोष-दुःख देखकर उचित उपाय करो।
भावार्थ / व्याख्या:
श्रीराम के राज्य में बाधा डालने वाले स्वयं देवता थे — यह शकुन सत्य भाव से कहना चाहिए। देवताओं द्वारा किए गए दोष और दुःख को देखकर उचित उपाय करना चाहिए।
रामायण में अनेक बार देवताओं ने ही परिस्थितियाँ बनाईं — कैकेयी की मति फेरना, सीता-त्याग की स्थिति। उनका उद्देश्य बड़ा था, परंतु उससे मनुष्यों को कष्ट भी हुआ।
शकुन की दृष्टि से यह दोहा बताता है कि कुछ बाधाएँ ऐसी होती हैं जिनका कारण मनुष्य नहीं, बड़ी शक्तियाँ या परिस्थितियाँ होती हैं। ऐसे समय में किसी व्यक्ति को दोष देने के बजाय उचित उपाय — दान, पूजा, शांति-कर्म — करना चाहिए।
शकुन फल:
यह शकुन देवकृत बाधा और उपाय की आवश्यकता बताता है। निम्नलिखित प्रश्नों में:
- ऐसी बाधा जिसका कोई मानवीय कारण न हो
- ग्रह-दोष या दैवी बाधा की आशंका
- शांति-कर्म, पूजा या उपाय की आवश्यकता
- बार-बार आने वाली अकारण रुकावट
- किसी को दोष देने के बजाय समाधान खोजना
इस दोहे के आने पर बाधा का कारण मानवीय नहीं है। किसी को दोष न दें — उचित उपाय, दान और शांति-कर्म करें। यही मार्ग बताया गया है।
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