रामायण, महाभारत, गीता, वेद तथा पुराण की कथाएं

रामाज्ञा प्रश्न / सप्तम सर्ग / सप्तक 4 / श्लोक 6

रामाज्ञा प्रश्न सप्तम सर्ग सप्तक 4 श्लोक 6 — राम-चरणों में प्रीति-प्रतीति के बिना बड़ी आशा और लोभ; असंतोष और मन-क्षोभ का शकुन।

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तुलसीदास जी की यह कृति प्रश्न और उत्तर की उस प्राचीन पद्धति को जीवित रखती है जिसमें रामकथा ही प्रमाण है। यह दोहा सप्तम सर्ग के चौथे सप्तक में क्रम से छठा है — यहाँ ध्यान, श्रद्धा और एकाग्रता पर बल दिया गया है।

भरोसा नहीं, पर लोभ बड़ा — कहीं संतोष नहीं, मन में क्षोभ।

मूल दोहा: प्रीति प्रतीति न राम पद, बड़ी आस बड़ लोभ। नहिं सपनेहुँ संतोष सुख, जहाँ तहाँ मन छोभ॥६॥

शब्दार्थ:

  • प्रीति प्रतीति न = प्रेम और विश्वास नहीं
  • राम पद = श्रीराम के चरणों में
  • बड़ी आस = बड़ी आशा
  • बड़ लोभ = बड़ा लोभ
  • नहिं सपनेहुँ = स्वप्न में भी नहीं
  • संतोष सुख = संतोष और सुख
  • जहाँ तहाँ = जहाँ-तहाँ
  • मन छोभ = मन में क्षोभ

प्रीति प्रतीति न राम पद, बड़ी आस बड़ लोभ = राम-चरणों में प्रेम-विश्वास नहीं, पर आशा और लोभ बड़ा है। नहिं सपनेहुँ संतोष सुख, जहाँ तहाँ मन छोभ = स्वप्न में भी संतोष नहीं, जहाँ-तहाँ मन में क्षोभ।

भावार्थ / व्याख्या:

जब श्रीराम के चरणों में प्रेम और विश्वास न हो, परंतु आशा और लोभ बहुत बड़े हों, तब स्वप्न में भी संतोष और सुख नहीं मिलता और जहाँ-तहाँ मन में क्षोभ बना रहता है।

यह दोहा असंतोष के मूल कारण को पकड़ता है। समस्या साधनों की कमी नहीं, बल्कि आधार का अभाव है — जब भरोसा नहीं होता और अपेक्षाएँ बड़ी होती हैं, तब मन कभी शांत नहीं रहता।

शकुन की दृष्टि से यह दोहा उन प्रश्नकर्ताओं के लिए है जो लगातार बेचैन हैं। यह चेतावनी भी है और उपाय भी — अपेक्षाएँ घटाइए और भरोसा बढ़ाइए, संतोष स्वयं आ जाएगा।

शकुन फल:

यह शकुन असंतोष और मानसिक क्षोभ का सूचक है। निम्नलिखित प्रश्नों में:

  • लगातार बनी रहने वाली बेचैनी और असंतोष
  • बहुत बड़ी अपेक्षा या महत्वाकांक्षा
  • लोभ या जल्दी अमीर बनने की चाह
  • मन की अशांति और अस्थिरता
  • सब कुछ होते हुए भी सुख का अभाव

इस दोहे के आने पर असंतोष की स्थिति है। समस्या साधनों की नहीं, अपेक्षाओं की है। अपेक्षाएँ संतुलित करें और भरोसा बढ़ाएँ — संतोष स्वयं आएगा।

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