रामाज्ञा प्रश्न / सप्तम सर्ग / सप्तक 3 / श्लोक 4
रामाज्ञा प्रश्न सप्तम सर्ग सप्तक 3 श्लोक 4 — सुमित्राजी के नियमित नाम-स्मरण से स्त्रियों को लक्ष्मण-शत्रुघ्न जैसी संतान और पति-प्रेम का शकुन।
इस ग्रंथ की विशेषता यह है कि प्रत्येक दोहा रामकथा का एक प्रसंग भी है और प्रश्न का फल भी। सप्तम सर्ग के तीसरे सप्तक का यह चौथा दोहा है; इस सर्ग में दिन, वार और मुहूर्त के अनुसार फल का विचार मिलता है।
सुमित्राजी का नाम-स्मरण — स्त्रियों को लक्ष्मण-शत्रुघ्न जैसे पुत्र और पति-प्रेम।
मूल दोहा: सुमिरि सुमित्रा नाम जग, जे तिय लेहिं सुनेम। सबन लषन रिपुदवनु से, पावहिं पति पद प्रेम॥४॥
शब्दार्थ:
- सुमिरि = स्मरण करके
- सुमित्रा नाम = सुमित्राजी का नाम
- जग = संसार में
- जे तिय = जो स्त्रियाँ
- लेहिं सुनेम = नियमपूर्वक लेती हैं
- सबन = संतान रूप में
- लषन रिपुदवनु = लक्ष्मण और शत्रुघ्न
- पावहिं = पाती हैं
- पति पद प्रेम = पति के चरणों का प्रेम
सुमिरि सुमित्रा नाम जग, जे तिय लेहिं सुनेम = जो स्त्रियाँ नियमपूर्वक सुमित्राजी का नाम लेती हैं। सबन लषन रिपुदवनु से, पावहिं पति पद प्रेम = लक्ष्मण-शत्रुघ्न जैसी संतान और पति का प्रेम पाती हैं।
भावार्थ / व्याख्या:
संसार में जो स्त्रियाँ नियमपूर्वक माता सुमित्राजी का नाम स्मरण करती हैं, वे लक्ष्मणजी और शत्रुघ्नजी जैसी संतान तथा पति के चरणों का प्रेम प्राप्त करती हैं।
सुमित्राजी रामायण की सबसे कम बोलने वाली परंतु सबसे उदार माता हैं। उन्होंने अपने दोनों पुत्रों को सेवा के लिए दे दिया — लक्ष्मण को राम की सेवा में और शत्रुघ्न को भरत की।
शकुन की दृष्टि से यह दोहा स्त्रियों के लिए दो स्पष्ट फल बताता है — उत्तम संतान और दांपत्य प्रेम। ‘सुनेम’ अर्थात् नियमपूर्वक — एक बार का नहीं, नियमित स्मरण आवश्यक है।
शकुन फल:
यह शकुन स्त्रियों के लिए उत्तम संतान और पति-प्रेम का सूचक है। निम्नलिखित प्रश्नों में:
- संतान प्राप्ति और उत्तम संतान
- दांपत्य जीवन में प्रेम और सामंजस्य
- स्त्रियों द्वारा किया जाने वाला व्रत या नियम
- संतान के गुण और संस्कार
- परिवार में त्याग और उदारता का फल
इस दोहे के आने पर स्त्रियों को उत्तम संतान और पति का प्रेम मिलेगा। नियमपूर्वक स्मरण करती रहें — फल अवश्य मिलेगा।
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