रामाज्ञा प्रश्न / षष्ठम सर्ग / सप्तक 6 / श्लोक 4
रामाज्ञा प्रश्न षष्ठम सर्ग सप्तक 6 श्लोक 4 — सीताजी पर कलंक लगाकर की जाने वाली लोकनिंदा; अपयश का सूचक शकुन।
सात सर्ग, प्रत्येक सर्ग में सात सप्तक और प्रत्येक सप्तक में सात दोहे — यही ॥रामाज्ञा प्रश्न॥ की सरल किंतु सुगठित संरचना है। इस छठे सप्तक के चौथा दोहे में षष्ठम सर्ग का वह भाव है जहाँ हर्ष के साथ-साथ वियोग की छाया भी दिखाई देती है।
सीताजी पर कलंक और लोकनिंदा — अपयश होगा।
मूल दोहा: राम कुचरचा करहिं सब सीतहि लाइ कलंका। सदा अभागी लोग जग, कहत सकोचु न संक॥४॥
शब्दार्थ:
- कुचरचा = निंदा, बुरी चर्चा
- करहिं = करते हैं
- सीतहि = सीताजी को
- लाइ कलंका = कलंक लगाकर
- सदा अभागी = सदा से अभागे
- लोग जग = संसार के लोग
- सकोचु = संकोच
- न संक = न शंका
राम कुचरचा करहिं सब सीतहि लाइ कलंका = लोग जानकीजी को कलंक लगाकर श्रीराम की निंदा करते हैं। कहत सकोचु न संक = कहते हुए उन्हें संकोच और शंका भी नहीं होती।
भावार्थ / व्याख्या:
लोग श्रीजानकीजी को कलंक लगाकर श्रीराम की निंदा करते हैं। तुलसीदास जी टिप्पणी करते हैं कि जगत के लोग सदा से अभागे हैं — ऐसी बात कहते हुए उन्हें संकोच और शंका भी नहीं होती।
यह उत्तरकांड का सबसे कटु प्रसंग है। जिस सीताजी ने अग्नि-परीक्षा दी थी, उन्हीं पर लोकनिंदा हुई।
तुलसीदास जी इसका शकुन-फल बताते हैं — अपयश होगा। शकुन की दृष्टि से यह दोहा उन प्रश्नों में चेतावनी देता है जहाँ बदनामी, अफवाह या लोकनिंदा की आशंका हो। इस समय अपनी छवि और प्रतिष्ठा का विशेष ध्यान रखना आवश्यक है।
शकुन फल:
यह शकुन अपयश का सूचक है। निम्नलिखित प्रश्नों में विशेष सावधानी:
- बदनामी, अफवाह या लोकनिंदा की आशंका
- निर्दोष होते हुए भी लगने वाला आरोप
- सार्वजनिक छवि या प्रतिष्ठा को हानि
- किसी के बारे में फैलाई जा रही गलत बात
- सामाजिक दबाव की स्थिति
इस दोहे के आने पर अपयश की आशंका है। अपनी छवि और आचरण का विशेष ध्यान रखें, और सुनी-सुनाई बातों को आगे न बढ़ाएँ।
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