रामाज्ञा प्रश्न / षष्ठम सर्ग / सप्तक 4 / श्लोक 6
रामाज्ञा प्रश्न षष्ठम सर्ग सप्तक 4 श्लोक 6 — लक्ष्मणजी के चरणों में नत होकर सेवक-मित्र-भाई का हित; हितकारी साथी मिलने का शुभ शकुन।
तुलसीदास जी की यह कृति प्रश्न और उत्तर की उस प्राचीन पद्धति को जीवित रखती है जिसमें रामकथा ही प्रमाण है। यह दोहा षष्ठम सर्ग के चौथे सप्तक में क्रम से छठा है — यहाँ प्रेम, धर्म और मर्यादा के भाव प्रमुख हैं।
सेवक, मित्र और भाई का हित — हितकारी साथी की प्राप्ति।
मूल दोहा: सेवक सखा सुबंधु हित नाइ लखन पद माथु। कीजिय प्रीति प्रतीति सुभ, सगुन सुमंगल साथु॥६॥
शब्दार्थ:
- सेवक = सेवक
- सखा = मित्र
- सुबंधु = अच्छा भाई
- हित = हित करो
- नाइ = झुकाकर
- लखन पद माथु = लक्ष्मणजी के चरणों में मस्तक
- प्रीति प्रतीति = प्रेम और विश्वास
- सुमंगल साथु = कल्याणकारी साथी
सेवक सखा सुबंधु हित नाइ लखन पद माथु = लक्ष्मणजी के चरणों में मस्तक झुकाकर सेवक, मित्र और भाई का हित करो। सगुन सुमंगल साथु = हितकारी साथी की प्राप्ति होगी।
भावार्थ / व्याख्या:
श्रीलक्ष्मणजी के चरणों में मस्तक झुकाकर सेवक, मित्र तथा अच्छे भाई का हित करो — प्रेम तथा विश्वास बना रहेगा।
तुलसीदास जी कहते हैं कि यह शुभ शकुन परम हितकारी साथी की प्राप्ति बतलाता है।
इस दोहे में एक सुंदर सिद्धांत है — पहले दूसरों का हित करो, तब अच्छे साथी अपने आप मिलेंगे। लक्ष्मणजी इसका उदाहरण हैं, जिन्होंने चौदह वर्ष निःस्वार्थ सेवा की। शकुन की दृष्टि से यह दोहा संबंधों और साझेदारी से जुड़े प्रश्नों में अनुकूल है।
शकुन फल:
यह शुभ शकुन हितकारी साथी की प्राप्ति बतलाता है। निम्नलिखित प्रश्नों में:
- अच्छे साथी, मित्र या साझेदार की तलाश
- कर्मचारी या सहयोगी से संबंध
- भाई-बहनों से जुड़ा प्रश्न
- किसी का हित या सहायता करने का अवसर
- प्रेम और विश्वास पर आधारित संबंध
इस दोहे के आने पर हितकारी साथी मिलेगा। पहले दूसरों का हित करें — अच्छे लोग अपने आप जुड़ेंगे।
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