रामाज्ञा प्रश्न / षष्ठम सर्ग / सप्तक 3 / श्लोक 5
रामाज्ञा प्रश्न षष्ठम सर्ग सप्तक 3 श्लोक 5 — कुंभकर्ण, रावण और मेघनाद का काल-नदी तट के वृक्षों समान पतन; यह प्रश्न-फल अशुभ है।
तुलसीदास जी ने ॥रामाज्ञा प्रश्न॥ की रचना उनके लिए की जो किसी निर्णय पर पहुँचने से पहले प्रभु का संकेत जान लेना चाहते हैं। षष्ठम सर्ग के तीसरे सप्तक का यह पाँचवाँ दोहा है; परदेस गए व्यक्ति के लौटने से जुड़े प्रश्नों में यह सर्ग विशेष देखा जाता है।
काल-नदी के तीर के वृक्षों का गिरना — यह प्रश्न-फल अशुभ है।
मूल दोहा: कुंभकरन रावन सरिस मेघनाद से बीर। ढहे समूल बिसाल तरु काल नदी के तीर॥५॥
शब्दार्थ:
- कुंभकरन = कुंभकर्ण
- सरिस = के समान
- मेघनाद = मेघनाद
- बीर = वीर
- ढहे समूल = जड़ सहित गिर गए
- बिसाल तरु = विशाल वृक्ष
- काल नदी = काल रूपी नदी
- तीर = किनारे
कुंभकरन रावन सरिस मेघनाद से बीर = कुंभकर्ण, रावण और मेघनाद जैसे वीर। ढहे समूल बिसाल तरु काल नदी के तीर = काल-नदी के किनारे के विशाल वृक्षों के समान जड़ सहित गिर गए।
भावार्थ / व्याख्या:
कुंभकर्ण, रावण तथा मेघनाद जैसे वीर नदी-किनारे के विशाल वृक्ष के समान काल के वेग में जड़ के साथ गिर गए।
यह रूपक अत्यंत मार्मिक है। नदी के किनारे खड़ा वृक्ष कितना भी विशाल हो, धारा उसकी जड़ें काटती रहती है और एक दिन वह गिर जाता है।
तुलसीदास जी इस प्रश्न-फल को ‘अशुभ’ कहते हैं। शकुन की दृष्टि से यह दोहा उन प्रश्नों में चेतावनी देता है जहाँ किसी बड़ी स्थिति, संपत्ति या पद के अचानक ढह जाने की आशंका हो। बड़ा होना सुरक्षा की गारंटी नहीं है — नींव की जाँच आवश्यक है।
शकुन फल:
यह प्रश्न-फल अशुभ है। निम्नलिखित प्रश्नों में विशेष सावधानी:
- किसी बड़ी स्थिति या पद के गिरने की आशंका
- संपत्ति, व्यवसाय या साख की नींव कमज़ोर होना
- बाहर से मज़बूत परंतु भीतर से खोखली स्थिति
- बड़े लोगों या संस्थाओं का अचानक पतन
- समय के साथ धीरे-धीरे बढ़ता जोखिम
इस दोहे के आने पर प्रश्न-फल अशुभ है। जो स्थिति मज़बूत दिख रही है, उसकी नींव की जाँच करें। बड़ा होना सुरक्षा की गारंटी नहीं है।
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