रामाज्ञा प्रश्न / षष्ठम सर्ग / सप्तक 3 / श्लोक 1
रामाज्ञा प्रश्न षष्ठम सर्ग सप्तक 3 श्लोक 1 — देव-जयकार के बीच श्रीराम का अयोध्या-नरेश बनना; श्रेष्ठ मंगलों की जड़ कहा गया शकुन।
गोस्वामी तुलसीदास जी रचित ॥रामाज्ञा प्रश्न॥ सात सर्गों का ग्रंथ है, जिसका प्रत्येक सर्ग सात सप्तकों में और प्रत्येक सप्तक सात दोहों में बँटा हुआ है। षष्ठम सर्ग के तीसरे सप्तक का यह पहला दोहा है; परदेस गए व्यक्ति के लौटने से जुड़े प्रश्नों में यह सर्ग विशेष देखा जाता है।
श्रीराम का अयोध्या-नरेश बनना — यह शकुन श्रेष्ठ मंगलों की जड़ है।
मूल दोहा: जय धुनि गान निसान सुर बरषत सुरतरु फूल। भए राम राजा अवध, सगुन सुमंगल मूल॥१॥
शब्दार्थ:
- जय धुनि = जय-जयकार
- गान = मंगलगान
- निसान = दुंदुभि
- सुर = देवता
- बरषत = वर्षा करते हैं
- सुरतरु फूल = कल्पवृक्ष के पुष्प
- भए राम राजा = श्रीराम राजा हो गए
- सुमंगल मूल = मंगलों की जड़
जय धुनि गान निसान सुर बरषत सुरतरु फूल = देवता जय-जयकार, मंगलगान और कल्पवृक्ष की पुष्प-वर्षा कर रहे हैं। भए राम राजा अवध, सगुन सुमंगल मूल = श्रीराम अयोध्या-नरेश हुए, यह शकुन मंगलों की जड़ है।
भावार्थ / व्याख्या:
देवता जय-जयकार एवं मंगलगान करते और दुंदुभि बजाते हुए कल्पवृक्ष के पुष्पों की वर्षा कर रहे हैं। श्रीराम अयोध्या-नरेश हो गए।
यह वह क्षण है जिसकी प्रतीक्षा चौदह वर्ष से थी। जो राज्याभिषेक वनवास के कारण रुक गया था, वह अंततः संपन्न हुआ।
तुलसीदास जी कहते हैं कि यह शकुन श्रेष्ठ मंगलों की जड़ है। शकुन की दृष्टि से यह दोहा उन प्रश्नों में अत्यंत अनुकूल है जहाँ लंबे समय से रुका हुआ कोई शुभ कार्य या अधिकार अंततः मिलने वाला हो।
शकुन फल:
यह शकुन श्रेष्ठ मंगलों की जड़ है। निम्नलिखित प्रश्नों में:
- लंबे समय से रुका हुआ अधिकार या पद
- पदोन्नति, नियुक्ति या नेतृत्व
- किसी शुभ कार्य की अंततः पूर्ति
- सार्वजनिक सम्मान और मान्यता
- दीर्घकालिक और स्थायी शुभता का आरंभ
इस दोहे के आने पर श्रेष्ठ मंगलों की जड़ पड़ रही है। जो रुका था वह मिलेगा और उससे आगे और मंगल फूटेंगे।
आस्था और भक्ति के हमारे मिशन का समर्थन करेंहर सहयोग, चाहे बड़ा हो या छोटा, फर्क डालता है! आपका सहयोग हमें इस मंच को बनाए रखने और पौराणिक कहानियों को अधिक लोगो तक फैलाने में मदद करता है। सहयोग करें |
टिप्पणियाँ बंद हैं।