रामाज्ञा प्रश्न / षष्ठम सर्ग / सप्तक 1 / श्लोक 2
रामाज्ञा प्रश्न षष्ठम सर्ग सप्तक 1 श्लोक 2 — हनुमानजी का जानकीजी को आदरपूर्वक प्रभु के पास लाना; परस्पर प्रेम और सुमंगल का शकुन।
॥रामाज्ञा प्रश्न॥ में तुलसीदास जी ने रामकथा के प्रसंगों को ऐसे दोहों में ढाला है कि हर दोहा प्रश्नकर्ता को सीधा संकेत दे जाता है। यह पहले सप्तक का दूसरा दोहा है। षष्ठम सर्ग विजय के पश्चात अयोध्या-वापसी और राज्याभिषेक के प्रसंगों का सर्ग है।
जानकीजी का प्रभु के पास आना — परस्पर प्रेम और सुकाल।
मूल दोहा: सादर आनी जानकी हनुमान प्रभु पास। प्रीति परस्पर समउ सुभ सगुन सुमंगल बास॥२॥
शब्दार्थ:
- सादर = आदरपूर्वक
- आनी = ले आए
- जानकी = जानकीजी
- प्रभु पास = प्रभु के समीप
- प्रीति परस्पर = परस्पर प्रेम
- समउ सुभ = समय शुभ
- सुमंगल बास = मंगल का निवास
सादर आनी जानकी हनुमान प्रभु पास = हनुमानजी आदरपूर्वक जानकीजी को प्रभु के समीप ले आए। प्रीति परस्पर समउ सुभ = परस्पर प्रेम रहेगा, समय शुभ रहेगा।
भावार्थ / व्याख्या:
हनुमानजी आदरपूर्वक श्रीजानकीजी को प्रभु के समीप ले आए। यह वह क्षण था जिसकी प्रतीक्षा पूरे युद्ध ने की थी — बिछड़े हुए का मिलन।
तुलसीदास जी कहते हैं कि यह शकुन सुमंगल का निवास है — परस्पर प्रेम रहेगा और समय सुंदर रहेगा।
शकुन की दृष्टि से यह दोहा उन प्रश्नों में विशेष अनुकूल है जहाँ बिछड़े हुए का मिलन, रूठे संबंध का जुड़ना या पति-पत्नी के संबंध विषय हों। ‘सुमंगल बास’ अर्थात् मंगल का निवास — यह क्षणिक नहीं, स्थायी शुभता है।
शकुन फल:
यह शकुन सुमंगल का निवास है। निम्नलिखित प्रश्नों में परिणाम अनुकूल रहेगा:
- बिछड़े हुए प्रियजन का मिलन
- पति-पत्नी के संबंध और दांपत्य सुख
- रूठे संबंध का पुनः जुड़ना
- किसी मध्यस्थ के माध्यम से बनने वाला मेल
- लंबे इंतज़ार के बाद मिलने वाला सुख
इस दोहे के आने पर सुमंगल का निवास है। परस्पर प्रेम बना रहेगा और समय शुभ रहेगा। बिछड़े हुए मिलेंगे।
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