रामाज्ञा प्रश्न / षष्ठम सर्ग / सप्तक 1 / श्लोक 1
रामाज्ञा प्रश्न षष्ठम सर्ग सप्तक 1 श्लोक 1 — इंद्र की अमृत-वर्षा से सभी वानर-भालुओं का जीवित होना; पुनर्जीवन का शुभ शकुन।
गोस्वामी तुलसीदास जी रचित ॥रामाज्ञा प्रश्न॥ सात सर्गों का ग्रंथ है, जिसका प्रत्येक सर्ग सात सप्तकों में और प्रत्येक सप्तक सात दोहों में बँटा हुआ है। यह पहले सप्तक का पहला दोहा है। षष्ठम सर्ग विजय के पश्चात अयोध्या-वापसी और राज्याभिषेक के प्रसंगों का सर्ग है।
षष्ठम सर्ग का आरंभ — अमृत-वर्षा से वानरों का जीवित होना, शुभ शकुन।
मूल दोहा: रघुपति आयसु अमरपति अमिय सींचि कपि भालु। सकल जिआए सगुन सुभ सुमरहु राम कृपालु॥१॥
शब्दार्थ:
- रघुपति आयसु = श्रीरघुनाथजी की आज्ञा से
- अमरपति = देवराज इंद्र
- अमिय = अमृत
- सींचि = सींचकर, वर्षा करके
- कपि भालु = वानर-भालू
- जिआए = जीवित कर दिए
- सुमरहु = स्मरण करो
- कृपालु = कृपालु
अमरपति अमिय सींचि कपि भालु = देवराज इंद्र ने अमृत-वर्षा करके वानर-भालुओं को। सकल जिआए सगुन सुभ = सभी को जीवित कर दिया, यह शकुन शुभ है।
भावार्थ / व्याख्या:
श्रीरघुनाथजी की आज्ञा से देवराज इंद्र ने अमृत-वर्षा करके युद्ध में मारे गए सभी वानर-भालुओं को जीवित कर दिया। तुलसीदास जी कहते हैं कि कृपालु श्रीराम का स्मरण करो, यह शकुन शुभ है।
षष्ठम सर्ग का आरंभ ही पुनर्जीवन से होता है। जो युद्ध में खो गया था, वह लौट आया — यह पूरे सर्ग का स्वर तय कर देता है।
शकुन की दृष्टि से यह दोहा उन प्रश्नों में अत्यंत अनुकूल है जहाँ कोई खोई हुई चीज़ वापस मिलनी हो, बीमारी से स्वास्थ्य लौटना हो, या किसी ठप पड़े कार्य में फिर से जान आनी हो।
शकुन फल:
यह शकुन शुभ है और पुनर्जीवन का सूचक है। निम्नलिखित प्रश्नों में:
- रोग से स्वास्थ्य की वापसी
- ठप पड़े व्यवसाय या कार्य में नई जान
- खोई हुई वस्तु, पद या संबंध की वापसी
- किसी बड़ी हानि के बाद पुनर्निर्माण
- औषधि, उपचार या चिकित्सा का प्रभाव
इस दोहे के आने पर शकुन शुभ है। जो खो गया था वह लौटेगा और जो ठप पड़ा था उसमें फिर जान आएगी।
आस्था और भक्ति के हमारे मिशन का समर्थन करेंहर सहयोग, चाहे बड़ा हो या छोटा, फर्क डालता है! आपका सहयोग हमें इस मंच को बनाए रखने और पौराणिक कहानियों को अधिक लोगो तक फैलाने में मदद करता है। सहयोग करें |
टिप्पणियाँ बंद हैं।