रामाज्ञा प्रश्न / पंचम सर्ग / सप्तक 6 / श्लोक 5
रामाज्ञा प्रश्न पंचम सर्ग सप्तक 6 श्लोक 5 — प्रभु के प्रताप रूपी अग्नि में पतंगों समान गिरती राक्षस सेना; यह प्रश्न-फल अशुभ है।
जब मन किसी दुविधा में हो, तब ॥रामाज्ञा प्रश्न॥ का एक दोहा भी दिशा दिखाने के लिए पर्याप्त माना गया है। इस छठे सप्तक के पाँचवाँ दोहे में पंचम सर्ग का वह भाव है जो कहता है — प्रयत्न मत छोड़ो, मार्ग निकल आएगा।
राक्षस सेना का प्रताप-अग्नि में गिरना — यह प्रश्न-फल अशुभ है।
मूल दोहा: नीच निसाचर मीचु बस चले साजि चतुरंग। प्रभु प्रताप पावक प्रबल उड़ि उड़ि परत पतंग॥५॥
शब्दार्थ:
- नीच निसाचर = नीच राक्षस
- मीचु बस = मृत्यु के वश
- साजि = सजाकर
- चतुरंग = चतुरंगिणी सेना
- प्रभु प्रताप = प्रभु का प्रताप
- पावक = अग्नि
- प्रबल = प्रचंड
- पतंग = पतंगे
नीच निसाचर मीचु बस चले साजि चतुरंग = मृत्यु के वश राक्षस चतुरंगिणी सेना सजाकर चले। उड़ि उड़ि परत पतंग = पतंगों के समान उड़-उड़कर गिर रहे हैं।
भावार्थ / व्याख्या:
नीच राक्षस मृत्यु के वश होकर चतुरंगिणी सेना सजाकर चले। प्रभु श्रीरामजी का प्रताप प्रचंड अग्नि के समान है, जिसमें पतंगों के समान ये उड़-उड़कर गिर रहे हैं।
पतंगे का रूपक बार-बार आता है क्योंकि वह अपने विनाश की ओर स्वयं जाता है।
तुलसीदास जी इस प्रश्न-फल को ‘अशुभ’ कहते हैं। शकुन की दृष्टि से यह दोहा उन प्रश्नों में स्पष्ट चेतावनी है जहाँ प्रश्नकर्ता किसी बड़ी शक्ति से टकराने जा रहा हो। सेना कितनी भी बड़ी हो, यदि दिशा गलत है तो परिणाम विनाश ही होगा।
शकुन फल:
यह प्रश्न-फल अशुभ है। निम्नलिखित प्रश्नों में विशेष सतर्कता:
- अपने से बड़ी शक्ति से टकराव
- बड़ी तैयारी के बावजूद गलत दिशा में प्रयास
- ऐसा संघर्ष जिसमें हार की संभावना अधिक
- संसाधन लगाकर भी विफल होने वाला कार्य
- अन्याय या अधर्म के पक्ष में खड़ा होना
इस दोहे के आने पर प्रश्न-फल अशुभ है। तैयारी कितनी भी बड़ी हो, यदि दिशा गलत है तो हानि होगी। पहले अपना पक्ष जाँचें, फिर आगे बढ़ें।
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