रामाज्ञा प्रश्न / पंचम सर्ग / सप्तक 3 / श्लोक 2
रामाज्ञा प्रश्न पंचम सर्ग सप्तक 3 श्लोक 2 — मुद्रिका पाकर सीताजी का हर्ष-विषाद और हनुमानजी को आशीर्वाद; शुभ प्रश्न-फल।
॥रामाज्ञा प्रश्न॥ में तुलसीदास जी ने रामकथा के प्रसंगों को ऐसे दोहों में ढाला है कि हर दोहा प्रश्नकर्ता को सीधा संकेत दे जाता है। पंचम सर्ग के तीसरे सप्तक का यह दूसरा दोहा है; इस सर्ग में कठिनाई को पार करने का बल बार-बार दिखाई देता है।
मुद्रिका पाकर हर्ष और विषाद — प्रश्न-फल शुभ है।
मूल दोहा: पाइ नाथ कर मुद्रिका सिय हियँ हरषु बिषादु। प्राननाथ प्रिय सेवकहि दीन्ह सुआसिरबादु॥२॥
शब्दार्थ:
- पाइ = पाकर
- नाथ कर = स्वामी के हाथ की
- मुद्रिका = अँगूठी
- हियँ = चित्त में
- हरषु = प्रसन्नता
- बिषादु = शोक
- प्राननाथ = प्राणनाथ
- प्रिय सेवकहि = प्रिय सेवक को
- सुआसिरबादु = शुभ आशीर्वाद
पाइ नाथ कर मुद्रिका सिय हियँ हरषु बिषादु = स्वामी के हाथ की अँगूठी पाकर सीताजी के चित्त में हर्ष और शोक दोनों हुए। दीन्ह सुआसिरबादु = प्रिय सेवक को शुभ आशीर्वाद दिया।
भावार्थ / व्याख्या:
स्वामी के हाथ की अँगूठी पाकर श्रीजानकीजी के चित्त में प्रसन्नता तथा शोक दोनों हुए। फिर उन्होंने प्राणनाथ के प्रिय सेवक हनुमानजी को शुभ आशीर्वाद दिया।
हर्ष इसलिए कि प्रियतम का चिह्न मिला, और विषाद इसलिए कि वे स्वयं नहीं आए। ऐसी मिश्रित भावनाएँ जीवन में प्रायः आती हैं।
तुलसीदास जी इस प्रश्न-फल को शुभ कहते हैं, यद्यपि इसमें विषाद का उल्लेख भी है। इसका कारण यह है कि आशीर्वाद पर समापन होता है। शकुन की दृष्टि से यह दोहा बताता है कि परिणाम अंततः शुभ रहेगा, भले ही बीच में भावनात्मक उतार-चढ़ाव हो।
शकुन फल:
यह प्रश्न-फल शुभ है। निम्नलिखित प्रश्नों में परिणाम अनुकूल रहेगा:
- किसी प्रिय व्यक्ति की भेजी वस्तु या संदेश
- भावनात्मक उतार-चढ़ाव वाली स्थिति
- किसी की सेवा का सम्मान और आशीर्वाद
- आंशिक राहत पर पूर्ण आश्वासन
- लंबे वियोग के बाद मिलने वाला संपर्क
इस दोहे के आने पर प्रश्न-फल शुभ है। बीच में भावनाओं का उतार-चढ़ाव होगा, पर अंत आशीर्वाद और शुभता पर होगा।
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