रामाज्ञा प्रश्न / पंचम सर्ग / सप्तक 3 / श्लोक 1
रामाज्ञा प्रश्न पंचम सर्ग सप्तक 3 श्लोक 1 — हनुमानजी का गुप्त संदेश और मुद्रिका देना; दुःख के समय आश्वासन मिलने का शकुन।
गोस्वामी तुलसीदास जी रचित ॥रामाज्ञा प्रश्न॥ सात सर्गों का ग्रंथ है, जिसका प्रत्येक सर्ग सात सप्तकों में और प्रत्येक सप्तक सात दोहों में बँटा हुआ है। पंचम सर्ग के तीसरे सप्तक का यह पहला दोहा है; इस सर्ग में कठिनाई को पार करने का बल बार-बार दिखाई देता है।
मुद्रिका का समर्पण — दुःख के समय आश्वासन मिलेगा।
मूल दोहा: सुरुख जानकी जानि कपि कहे सकल संकेत। दीन्हि मुद्रिका लीन्ही सिय प्रीति प्रतीति समेत॥१॥
शब्दार्थ:
- सुरुख = प्रसन्न, अनुकूल
- जानि = समझकर
- सकल संकेत = सब गुप्त संदेश
- दीन्हि मुद्रिका = अँगूठी दी
- लीन्ही = ली
- प्रीति = प्रेम
- प्रतीति = विश्वास
- समेत = सहित
सुरुख जानकी जानि कपि कहे सकल संकेत = जानकीजी को प्रसन्न समझकर हनुमानजी ने सब संकेत कहे। प्रीति प्रतीति समेत = प्रेम और विश्वास के साथ मुद्रिका ली।
भावार्थ / व्याख्या:
श्रीजानकीजी को प्रसन्न समझकर हनुमानजी ने श्रीराम का सब गुप्त संदेश कहा और मुद्रिका दी, जिसे श्रीजानकीजी ने प्रेम तथा विश्वास के साथ स्वीकार किया।
मुद्रिका यहाँ केवल एक वस्तु नहीं थी — वह प्रमाण थी। शब्दों पर संदेह हो सकता था, पर उस अँगूठी पर नहीं।
तुलसीदास जी इसका शकुन-फल बताते हैं — दुःख के समय आश्वासन प्राप्त होगा। शकुन की दृष्टि से यह दोहा उन प्रश्नकर्ताओं के लिए है जो किसी कष्ट में हैं और जिन्हें भरोसे की आवश्यकता है।
शकुन फल:
यह शकुन दुःख के समय आश्वासन मिलने का सूचक है। निम्नलिखित प्रश्नों में:
- कष्ट या दुःख की स्थिति में सहारा मिलना
- किसी विश्वसनीय प्रमाण या दस्तावेज़ की प्राप्ति
- भरोसा और विश्वास बनने का अवसर
- गुप्त संदेश या महत्वपूर्ण सूचना
- किसी के द्वारा भेजा गया आश्वासन
इस दोहे के आने पर दुःख के समय आश्वासन मिलेगा। जिस भरोसे की आवश्यकता है वह मिलेगा — और वह ठोस प्रमाण के साथ आएगा।
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