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रामाज्ञा प्रश्न / चतुर्थ सर्ग / सप्तक 4 / श्लोक 5

रामाज्ञा प्रश्न चतुर्थ सर्ग सप्तक 4 श्लोक 5 — यज्ञभूमि शोधन में सीताजी का प्राकट्य, मानो पुण्य-समुद्र से लक्ष्मी; कन्या-प्राप्ति का शकुन।

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जब मन किसी दुविधा में हो, तब ॥रामाज्ञा प्रश्न॥ का एक दोहा भी दिशा दिखाने के लिए पर्याप्त माना गया है। यह दोहा चतुर्थ सर्ग के चौथे सप्तक में क्रम से पाँचवाँ है — यहाँ गुरु का आशीर्वाद और कुल की वृद्धि प्रमुख भाव हैं।

सीताजी का प्राकट्य — कन्या की प्राप्ति का शकुन।

मूल दोहा: सोधत मख महि जनकपुर सीय सुमंगल खानि। भूपति पुन्य पयोधि जनु रमा प्रगट भइ आनि॥५॥

शब्दार्थ:

  • सोधत = शुद्ध करते समय
  • मख महि = यज्ञभूमि
  • जनकपुर = जनकपुर
  • सुमंगल खानि = मंगलों की खान
  • भूपति = महाराज जनक
  • पुन्य पयोधि = पुण्य रूपी समुद्र
  • जनु = मानो
  • रमा = लक्ष्मीजी
  • प्रगट भइ = प्रकट हुईं

सोधत मख महि जनकपुर = जनकपुर में यज्ञभूमि शुद्ध करते समय। भूपति पुन्य पयोधि जनु रमा प्रगट भइ = मानो महाराज के पुण्य-समुद्र से लक्ष्मी प्रकट हो गईं।

भावार्थ / व्याख्या:

यज्ञभूमि शुद्ध करते समय जनकपुर में श्रेष्ठ मंगलों की खान सीताजी इस प्रकार प्रकट हुईं, मानो महाराज जनक के पुण्य रूपी समुद्र से निकलकर लक्ष्मी प्रकट हो गई हों।

समुद्र-मंथन से लक्ष्मी निकली थीं — तुलसीदास जी उसी की तुलना करते हैं। जनकजी के पुण्य समुद्र के समान थे और सीताजी उससे निकला रत्न।

तुलसीदास जी इसका शकुन-फल स्पष्ट बताते हैं — कन्या की प्राप्ति होगी। शकुन की दृष्टि से यह दोहा उन प्रश्नों में सीधा उत्तर देता है जहाँ संतान का लिंग या पुत्री-प्राप्ति विषय हो। साथ ही यह भूमि, खुदाई या किसी छिपे हुए धन की प्राप्ति का भी सूचक है।

शकुन फल:

यह शकुन कन्या-प्राप्ति का सूचक है। निम्नलिखित प्रश्नों में:

  • कन्या या पुत्री की प्राप्ति
  • भूमि, खुदाई या निर्माण कार्य से जुड़ा प्रश्न
  • कोई छिपा हुआ धन, रत्न या अवसर मिलना
  • यज्ञ-भूमि या पवित्र स्थान की स्थापना
  • लक्ष्मी अर्थात् धन-संपत्ति की प्राप्ति

इस दोहे के आने पर कन्या-प्राप्ति का संकेत मिलता है। साथ ही भूमि या किसी छिपे हुए अवसर से लाभ की संभावना है — वह आपके पुण्यों का ही फल होगा।

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