रामाज्ञा प्रश्न / चतुर्थ सर्ग / सप्तक 4 / श्लोक 3
रामाज्ञा प्रश्न चतुर्थ सर्ग सप्तक 4 श्लोक 3 — लक्ष्मणजी के दर्शन को नेत्रों का लाभ; पुत्र-रत्न और धर्म-अर्थ-काम-मोक्ष की प्राप्ति का शकुन।
शकुन शुभ है या अशुभ — यह निर्णय ॥रामाज्ञा प्रश्न॥ में उसी प्रसंग से होता है जो चुने हुए दोहे में वर्णित है। यह दोहा चतुर्थ सर्ग के चौथे सप्तक में क्रम से तीसरा है — यहाँ गुरु का आशीर्वाद और कुल की वृद्धि प्रमुख भाव हैं।
लक्ष्मणजी का दर्शन — पुत्र-रत्न और चारों फल की प्राप्ति।
मूल दोहा: ललित लाहु लोने लखनु, लोयन लाहु निहारि। सुत ललाम लालहु ललित, लेहु ललकि फल चारि॥३॥
शब्दार्थ:
- ललित = सुंदर
- लाहु = लाभ
- लोने = लावण्यमय
- लोयन = नेत्र
- निहारि = देखकर
- सुत ललाम = पुत्र-रत्न
- लालहु = लालन-पालन करो
- ललकि = उत्सुक होकर
- फल चारि = चारों फल — धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष
लोयन लाहु निहारि = उनके दर्शन को नेत्रों का लाभ समझो। लेहु ललकि फल चारि = उत्सुक होकर चारों फल प्राप्त करो।
भावार्थ / व्याख्या:
परम सुंदर श्रीलक्ष्मणजी के दर्शन को नेत्रों का लाभ समझो। यह शकुन कहता है कि सुंदर पुत्र-रत्न पाकर उसका लालन-पालन करो और उत्सुक बनकर चारों फल — धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष — प्राप्त करो।
इस दोहे में ‘ल’ अक्षर की सुंदर आवृत्ति है — ललित, लाहु, लोने, लखनु, लोयन, ललाम, लालहु, ललकि। यह तुलसीदास जी की काव्य-कुशलता का उदाहरण है।
शकुन की दृष्टि से यह दोहा अत्यंत व्यापक फल देता है — केवल संतान नहीं, बल्कि जीवन के चारों पुरुषार्थ। यह उन प्रश्नों में विशेष अनुकूल है जहाँ संपूर्ण जीवन की सफलता या संतुलन विषय हो।
शकुन फल:
यह शकुन पुत्र-रत्न और चारों पुरुषार्थ की प्राप्ति का सूचक है। निम्नलिखित प्रश्नों में:
- संतान प्राप्ति और उसका पालन-पोषण
- धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष — जीवन के चारों लक्ष्य
- जीवन में संतुलन और सर्वांगीण सफलता
- किसी शुभ दर्शन या भेंट का अवसर
- छोटे भाई या अनुज से जुड़ा प्रश्न
इस दोहे के आने पर पुत्र-रत्न और चारों फल की प्राप्ति का संकेत है। उत्साह के साथ आगे बढ़ें — जीवन के हर क्षेत्र में लाभ मिलेगा।
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