रामाज्ञा प्रश्न / चतुर्थ सर्ग / सप्तक 4 / श्लोक 2
रामाज्ञा प्रश्न चतुर्थ सर्ग सप्तक 4 श्लोक 2 — राम समान श्यामवर्ण, गुण-रूप निधान भरतजी का स्मरण; सभी कल्याण सुलभ होने का शुभ शकुन।
॥रामाज्ञा प्रश्न॥ तुलसीदास जी की उन रचनाओं में गिना जाता है जो भक्ति के साथ-साथ व्यावहारिक मार्गदर्शन भी देती हैं। यह दोहा चतुर्थ सर्ग के चौथे सप्तक में क्रम से दूसरा है — यहाँ गुरु का आशीर्वाद और कुल की वृद्धि प्रमुख भाव हैं।
भरतजी की महिमा — सेवकों को सुख देने वाले, प्रश्न-फल शुभ।
मूल दोहा: भरतु स्यामतन राम सम, सब गुन रूप निधान। सेवक सुखदायक सुलभ सुमिरत सब कल्यान॥२॥
शब्दार्थ:
- स्यामतन = साँवले शरीर वाले
- राम सम = श्रीराम के समान
- गुन रूप निधान = गुण और रूप के खजाने
- सेवक सुखदायक = सेवकों को सुख देने वाले
- सुलभ = सहज उपलब्ध
- सुमिरत = स्मरण करने से
- सब कल्यान = सभी कल्याण
भरतु स्यामतन राम सम = भरतजी श्रीराम के समान साँवले शरीर वाले हैं। सुमिरत सब कल्यान = उनका स्मरण करने से सभी कल्याण सुलभ हो जाते हैं।
भावार्थ / व्याख्या:
श्रीभरतजी श्रीरघुनाथजी के समान ही साँवले शरीर वाले और समस्त गुणों तथा रूप के खजाने हैं। वे सेवकों को सुख देने वाले हैं और उनका स्मरण करने से सभी कल्याण सुलभ हो जाते हैं।
तुलसीदास जी भरतजी को श्रीराम के समान बताते हैं — रूप में भी और गुण में भी। रामचरितमानस में भी वे कहते हैं कि भरत जैसा भाई मिलना दुर्लभ है।
‘सेवक सुखदायक सुलभ’ पद में तीनों शब्द महत्वपूर्ण हैं — वे सेवकों को सुख देते हैं और सहज उपलब्ध हैं। शकुन की दृष्टि से यह दोहा शुभ है और विशेषकर उन प्रश्नों में अनुकूल है जहाँ किसी बड़े से सहायता या सुगम मार्गदर्शन की आशा हो।
शकुन फल:
यह प्रश्न-फल शुभ है। निम्नलिखित प्रश्नों में परिणाम अनुकूल रहेगा:
- किसी बड़े या वरिष्ठ से सहज सहायता
- भाई या निकट संबंधी से सहयोग
- सेवक, कर्मचारी या अधीनस्थ का कल्याण
- सुलभ और सरल उपाय से बनने वाला कार्य
- सभी प्रकार के कल्याण की कामना
इस दोहे के आने पर प्रश्न-फल शुभ है। सहायता सहज मिलेगी और सभी कल्याण सुलभ होंगे। जिससे आशा है, वह निराश नहीं करेगा।
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