रामाज्ञा प्रश्न / चतुर्थ सर्ग / सप्तक 3 / श्लोक 5
रामाज्ञा प्रश्न चतुर्थ सर्ग सप्तक 3 श्लोक 5 — दशरथजी द्वारा ब्राह्मण, भाट, नट और नगरवासियों को यथायोग्य दान-सम्मान; श्रेष्ठ प्रश्न-फल।
तुलसीदास जी ने ॥रामाज्ञा प्रश्न॥ की रचना उनके लिए की जो किसी निर्णय पर पहुँचने से पहले प्रभु का संकेत जान लेना चाहते हैं। चतुर्थ सर्ग के तीसरे सप्तक का यह पाँचवाँ दोहा है; इस सर्ग की बाल-लीलाएँ प्रायः उत्तम प्रश्न-फल देती हैं।
सबको यथायोग्य दान और सम्मान — प्रश्न-फल श्रेष्ठ है।
मूल दोहा: भूपति भूसुर भाट नट जाचक पुर नर नारि। दिए दान सनमानि सब, पूजे कुल अनुहारि॥५॥
शब्दार्थ:
- भूसुर = ब्राह्मण
- भाट = भाट, स्तुति करने वाले
- नट = नट, कलाकार
- जाचक = भिक्षुक
- पुर नर नारि = नगर के स्त्री-पुरुष
- दिए दान = दान दिए
- सनमानि = सम्मानपूर्वक
- कुल अनुहारि = कुल के अनुसार
दिए दान सनमानि सब = सबको सम्मानपूर्वक दान दिए। पूजे कुल अनुहारि = उनके कुल के अनुसार पूजा की।
भावार्थ / व्याख्या:
महाराज दशरथ ने ब्राह्मण, भाट, नट, भिक्षुक तथा नगर के सभी स्त्री-पुरुषों को उनके कुल के अनुसार सम्मानपूर्वक दान देकर उनकी पूजा की।
इस दोहे में ‘सनमानि’ शब्द सबसे महत्वपूर्ण है। दान देना एक बात है और सम्मान के साथ देना दूसरी। दशरथजी ने दान इस तरह दिया कि लेने वाले को छोटा महसूस न हो।
तुलसीदास जी इस प्रश्न-फल को ‘श्रेष्ठ’ कहते हैं। शकुन की दृष्टि से यह दोहा उन प्रश्नों में विशेष अनुकूल है जहाँ दान, वितरण, वेतन या किसी को कुछ देने का विषय हो। संदेश यह है कि देते समय सम्मान अवश्य दें।
शकुन फल:
यह प्रश्न-फल श्रेष्ठ है। निम्नलिखित प्रश्नों में परिणाम अत्यंत अनुकूल:
- दान, दक्षिणा या भेंट देने का अवसर
- कर्मचारियों को वेतन, बोनस या पुरस्कार
- किसी की सहायता या सेवा का कार्य
- सामाजिक आयोजन में सबका सम्मान
- उदारता से बढ़ने वाली प्रतिष्ठा
इस दोहे के आने पर प्रश्न-फल श्रेष्ठ है। देते समय सम्मान अवश्य दें — यही आपकी प्रतिष्ठा को स्थायी बनाएगा।
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