रामाज्ञा प्रश्न / चतुर्थ सर्ग / सप्तक 3 / श्लोक 4
रामाज्ञा प्रश्न चतुर्थ सर्ग सप्तक 3 श्लोक 4 — शुभ दिन शोधकर पुत्रों का यज्ञोपवीत संस्कार और देवताओं की पुष्प-वर्षा; शुभ प्रश्न-फल।
इस ग्रंथ की विशेषता यह है कि प्रत्येक दोहा रामकथा का एक प्रसंग भी है और प्रश्न का फल भी। चतुर्थ सर्ग के तीसरे सप्तक का यह चौथा दोहा है; इस सर्ग की बाल-लीलाएँ प्रायः उत्तम प्रश्न-फल देती हैं।
शुभ दिन शोधकर यज्ञोपवीत संस्कार — प्रश्न-फल शुभ है।
मूल दोहा: सुदिन साधि मंगल किए, दिए भूप ब्रतबंध। अवध बधाव बिलोकि सुर बरषत सुमन सुगंध॥४॥
शब्दार्थ:
- सुदिन साधि = शुभ दिन शोधकर
- मंगल किए = मंगल-कार्य किए
- ब्रतबंध = यज्ञोपवीत संस्कार
- बधाव = बधाई
- बिलोकि = देखकर
- सुर = देवता
- बरषत = वर्षा करते हैं
- सुमन सुगंध = सुगंधित पुष्प
सुदिन साधि मंगल किए = शुभ दिन शोधकर मंगल-कार्य किए। दिए भूप ब्रतबंध = महाराज ने यज्ञोपवीत संस्कार कराया।
भावार्थ / व्याख्या:
महाराज दशरथ ने शुभ दिन शोधकर मंगल-कार्य करके पुत्रों का यज्ञोपवीत संस्कार कराया। अयोध्या में बधाई के बाजे बजते देख देवता सुगंधित पुष्पों की वर्षा कर रहे हैं।
‘सुदिन साधि’ अर्थात् शुभ दिन खोजकर — यह बताता है कि महत्वपूर्ण कार्यों के लिए उचित समय का चयन आवश्यक है। महाराज दशरथ ने जल्दबाज़ी नहीं की।
शकुन की दृष्टि से यह दोहा शुभ है और विशेषकर उन प्रश्नों में अनुकूल है जहाँ शिक्षा का आरंभ, दीक्षा या किसी नए चरण में प्रवेश विषय हो। यज्ञोपवीत संस्कार परंपरा में शिक्षा-आरंभ का प्रतीक है।
शकुन फल:
यह प्रश्न-फल शुभ है। निम्नलिखित प्रश्नों में परिणाम अनुकूल रहेगा:
- यज्ञोपवीत या अन्य संस्कार
- शिक्षा का आरंभ या नए पाठ्यक्रम में प्रवेश
- दीक्षा, गुरु-धारण या साधना का आरंभ
- शुभ दिन या मुहूर्त का चयन
- जीवन के नए चरण में प्रवेश
इस दोहे के आने पर प्रश्न-फल शुभ है। शुभ दिन देखकर कार्य करें — जल्दबाज़ी न करें। नए चरण का आरंभ मंगलमय होगा।
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