रामाज्ञा प्रश्न / चतुर्थ सर्ग / सप्तक 1 / श्लोक 1
रामाज्ञा प्रश्न चतुर्थ सर्ग सप्तक 1 श्लोक 1 — श्रीराम-जन्म समस्त पुण्यों और सुखों का सार; पुत्र-लाभ और परम कल्याण का सर्वोच्च शुभ शकुन।
गोस्वामी तुलसीदास जी रचित ॥रामाज्ञा प्रश्न॥ सात सर्गों का ग्रंथ है, जिसका प्रत्येक सर्ग सात सप्तकों में और प्रत्येक सप्तक सात दोहों में बँटा हुआ है। यह पहले सप्तक का पहला दोहा है। चतुर्थ सर्ग श्रीराम-जन्म से लेकर चारों भाइयों के विवाह तक के मंगलमय प्रसंगों का सर्ग है।
चतुर्थ सर्ग का आरंभ — श्रीराम-जन्म का प्रसंग, संतान-प्राप्ति का सर्वोच्च शकुन।
मूल दोहा: राम जनम सुभ सगुन भल सकल सुकृत सुख सारु। पुत्र लाभ कल्यानु बड़, मंगल चारु बिचारु॥१॥
शब्दार्थ:
- राम जनम = श्रीराम का जन्म
- सुभ सगुन = शुभ शकुन
- भल = उत्तम
- सकल सुकृत = समस्त पुण्य
- सारु = सार, निचोड़
- पुत्र लाभ = पुत्र की प्राप्ति
- कल्यानु बड़ = परम कल्याण
- चारु = सुंदर
राम जनम सुभ सगुन भल = श्रीराम का जन्म उत्तम शुभ शकुन है। पुत्र लाभ कल्यानु बड़ = पुत्र की प्राप्ति और परम कल्याण होगा।
भावार्थ / व्याख्या:
चतुर्थ सर्ग का आरंभ रामकथा के सबसे मंगलमय प्रसंग से होता है — श्रीराम का जन्म। तुलसीदास जी कहते हैं कि यह उत्तम शुभ शकुन है और समस्त पुण्यों तथा सुखों का सार है।
‘सार’ शब्द विशेष है। सार अर्थात् निचोड़ — जैसे दूध से मक्खन निकलता है। अर्थात् जितने भी पुण्य और सुख हैं, उन सबका निचोड़ यही एक क्षण है।
शकुन का फल स्पष्ट है — पुत्र की प्राप्ति होगी, परम कल्याण होगा और सुंदर मंगल समझो। शकुन की दृष्टि से यह दोहा संतान-प्राप्ति संबंधी प्रश्नों में रामाज्ञा प्रश्न का सर्वोच्च उत्तर माना जाता है।
शकुन फल:
यह उत्तम शुभ शकुन है और संतान-लाभ का सूचक है। निम्नलिखित प्रश्नों में:
- संतान प्राप्ति, विशेषकर पुत्र-लाभ
- संतान के स्वास्थ्य, शिक्षा या भविष्य
- परिवार में नए सदस्य का आगमन
- लंबे समय से प्रतीक्षित मनोकामना की पूर्ति
- पुण्य कर्मों का फल मिलना
इस दोहे के आने पर संतान-लाभ और परम कल्याण का सर्वोच्च शुभ संकेत मिलता है। जो प्रतीक्षा कर रहे हैं, उनकी प्रतीक्षा पूरी होगी।
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