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रामाज्ञा प्रश्न / तृतीय सर्ग / सप्तक 7 / श्लोक 5

रामाज्ञा प्रश्न तृतीय सर्ग सप्तक 7 श्लोक 5 — संपाती को देखकर वानरों का भय और निराशा; अकस्मात भय प्राप्त होने का शकुन।

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तुलसीदास जी ने ॥रामाज्ञा प्रश्न॥ की रचना उनके लिए की जो किसी निर्णय पर पहुँचने से पहले प्रभु का संकेत जान लेना चाहते हैं। तृतीय सर्ग, सातवें सप्तक और उसमें पाँचवाँ दोहा — इस सर्ग में शुभ और अशुभ का अंतर बहुत स्पष्ट दिखाई देता है।

संपाती को देखकर वानरों का भय — अकस्मात भय प्राप्त होगा।

मूल दोहा: सब सभीत संपाति लखि हहरे हृदयँ हरास। कहत परस्पर गीध गति, परिहरि जीवन आस॥५॥

शब्दार्थ:

  • सभीत = भयभीत
  • संपाति = संपाती (जटायु का भाई)
  • लखि = देखकर
  • हहरे = काँप उठे
  • हरास = निराशा
  • परस्पर = आपस में
  • गीध गति = जटायु की सद्गति
  • परिहरि = छोड़कर
  • जीवन आस = जीवित रहने की आशा

सब सभीत संपाति लखि = संपाती को देखकर सभी भयभीत हो गए। परिहरि जीवन आस = जीवित रहने की आशा छोड़ दी।

भावार्थ / व्याख्या:

विशालकाय गीध संपाती को देखकर सभी वानर डर गए और हृदय में निराशा से खिन्न हो गए। जीवित रहने की आशा छोड़कर वे परस्पर जटायु की सद्गति का वर्णन करने लगे।

यहाँ एक सुंदर विडंबना है — जिसे वे मृत्यु समझ रहे थे, वही आगे चलकर उनका सबसे बड़ा सहायक निकला। संपाती ने ही लंका में सीताजी का स्थान बताया।

तुलसीदास जी इसका फल बताते हैं — अकस्मात भय प्राप्त होगा। शकुन की दृष्टि से यह दोहा अल्पकालिक भय का सूचक है, परंतु उसमें एक छिपा हुआ संदेश भी है — जो पहली नज़र में खतरा लगे, वह सहायक भी हो सकता है।

शकुन फल:

यह शकुन अकस्मात भय का सूचक है। निम्नलिखित प्रश्नों में:

  • अचानक आने वाला भय या संकट
  • किसी अजनबी या भयावह लगने वाले व्यक्ति से सामना
  • निराशा और हार मान लेने की स्थिति
  • अप्रत्याशित घटना से उत्पन्न घबराहट
  • किसी अनजान परिस्थिति में प्रवेश

इस दोहे के आने पर अकस्मात भय की सूचना है। परंतु घबराएँ नहीं — जो पहली नज़र में खतरा लग रहा है, वह सहायक भी सिद्ध हो सकता है। बात किए बिना निष्कर्ष न निकालें।

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