रामायण, महाभारत, गीता, वेद तथा पुराण की कथाएं

रामाज्ञा प्रश्न / तृतीय सर्ग / सप्तक 3 / श्लोक 2

रामाज्ञा प्रश्न तृतीय सर्ग सप्तक 3 श्लोक 2 — सीता-हरण के समय का शकुन; भय, संदेह, संताप और पराभव का अत्यंत अशुभ संकेत।

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॥रामाज्ञा प्रश्न॥ में तुलसीदास जी ने रामकथा के प्रसंगों को ऐसे दोहों में ढाला है कि हर दोहा प्रश्नकर्ता को सीधा संकेत दे जाता है। तृतीय सर्ग के तीसरे सप्तक का यह दूसरा दोहा है; इस सर्ग में वन-प्रवास और राक्षसों से संघर्ष के प्रसंग प्रमुख हैं।

सीता-हरण का समय — भय, संदेह और पराभव का अत्यंत अशुभ शकुन।

मूल दोहा: सीय हरन अवसर सगुन भय संसय संताप। नारि काज हित निपट गत प्रगट पराभव पाप॥२॥

शब्दार्थ:

  • सीय हरन = सीता-हरण
  • अवसर = समय
  • भय = भय
  • संसय = संदेह
  • संताप = दुःख
  • नारि काज = स्त्रियों से संबंधित कार्य
  • निपट गत = पूर्णतः नष्ट
  • प्रगट = प्रकट, प्रसिद्ध
  • पराभव = पराजय

सीय हरन अवसर सगुन = सीता-हरण के समय का यह शकुन। प्रगट पराभव पाप = पराजय और पाप प्रकट होंगे।

भावार्थ / व्याख्या:

सीता-हरण के समय का यह शकुन भय, संदेह और दुःख बतलाता है। स्त्रियों की भलाई संबंधी कार्य पूर्णतः नष्ट हो जाएँगे तथा पराजय और पाप प्रकट होंगे।

यह रामाज्ञा प्रश्न के सर्वाधिक अशुभ दोहों में से एक है। सीता-हरण वह क्षण था जिसने संपूर्ण रामकथा की दिशा बदल दी और जिससे महायुद्ध का आरंभ हुआ।

शकुन की दृष्टि से यह दोहा स्पष्ट निषेध है, विशेषकर स्त्रियों से जुड़े प्रश्नों में। यह किसी बड़ी हानि, विश्वासघात या अपमानजनक स्थिति की चेतावनी देता है। इस समय किसी भी प्रकार का जोखिम नहीं लेना चाहिए और घर-परिवार, विशेषकर स्त्रियों की सुरक्षा का विशेष ध्यान रखना चाहिए।

शकुन फल:

यह शकुन भय, संदेह, पराजय और पाप का सूचक है। निम्नलिखित प्रश्नों में विशेष चेतावनी:

  • स्त्रियों से जुड़ा कोई भी कार्य या निर्णय
  • घर या परिवार की सुरक्षा का प्रश्न
  • किसी बड़ी हानि या विश्वासघात की आशंका
  • अकेले छोड़ना या असुरक्षित स्थिति में जाना
  • मान-सम्मान या प्रतिष्ठा पर आँच की आशंका

इस दोहे के आने पर स्थिति अत्यंत प्रतिकूल है। कोई भी नया कदम न उठाएँ, घर-परिवार की सुरक्षा का ध्यान रखें और किसी को अकेला न छोड़ें। यह समय पूर्ण सतर्कता का है।

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