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रामाज्ञा प्रश्न / तृतीय सर्ग / सप्तक 2 / श्लोक 5

रामाज्ञा प्रश्न तृतीय सर्ग सप्तक 2 श्लोक 5 — अपार अपशकुनों की अनदेखी कर रावण का मारीच से षड्यंत्र; यह प्रश्न-फल अनिष्ट है।

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जब मन किसी दुविधा में हो, तब ॥रामाज्ञा प्रश्न॥ का एक दोहा भी दिशा दिखाने के लिए पर्याप्त माना गया है। प्रस्तुत दोहा तृतीय सर्ग के दूसरे सप्तक में पाँचवाँ स्थान पर है, जहाँ छल, कलह और आकस्मिक भय की चेतावनियाँ बार-बार मिलती हैं।

रावण का अपशकुनों को अनदेखा करना — यह प्रश्न-फल अनिष्ट है।

मूल दोहा: बरबस गवनत रावनहि असगुन भए अपार। नीचु गनत नहिं मीचु बस मिलि मारीच बिचार॥५॥

शब्दार्थ:

  • बरबस = हठपूर्वक, ज़बरदस्ती
  • गवनत = जाते समय
  • असगुन = अपशकुन
  • अपार = बहुत अधिक
  • नीचु = नीच (रावण)
  • गनत नहिं = गिनता नहीं, ध्यान नहीं देता
  • मीचु बस = मृत्यु के वश
  • मारीच = मारीच राक्षस

बरबस गवनत रावनहि असगुन भए अपार = हठपूर्वक जाते समय रावण को अपार अपशकुन हुए। नीचु गनत नहिं मीचु बस = मृत्यु के वश वह नीच उन्हें गिनता ही नहीं।

भावार्थ / व्याख्या:

हठपूर्वक पंचवटी की ओर जाते समय रावण को बहुत अधिक अपशकुन हुए, किंतु मृत्यु के वश हुआ वह नीच उन्हें गिनता ही नहीं और मारीच से मिलकर सीता-हरण का विचार करता है।

इस दोहे में दो शब्द निर्णायक हैं — ‘बरबस’ अर्थात् हठपूर्वक, और ‘गनत नहिं’ अर्थात् ध्यान नहीं देता। रावण को संकेत मिल रहे थे, पर उसने हठ नहीं छोड़ा।

शकुन की दृष्टि से यह दोहा अनिष्ट सूचक है और इसका संदेश अत्यंत स्पष्ट है — यदि आप किसी कार्य को ज़िद में, चेतावनियों को अनदेखा करके कर रहे हैं, तो रुक जाइए। रावण का अंत उसकी शक्ति की कमी से नहीं, उसकी ज़िद से हुआ था।

शकुन फल:

यह प्रश्न-फल अनिष्ट है। निम्नलिखित प्रश्नों में विशेष चेतावनी:

  • ज़िद या हठ में किया जा रहा कोई कार्य
  • बार-बार मिल रही चेतावनियों की अनदेखी
  • किसी गलत सलाहकार के साथ मिलकर बनाई गई योजना
  • ऐसा कार्य जिसका विरोध सभी शुभचिंतक कर रहे हों
  • अनुचित साधन से लक्ष्य प्राप्त करने का प्रयास

इस दोहे के आने पर प्रश्न-फल अनिष्ट है। यदि आप हठ में आगे बढ़ रहे हैं तो तुरंत रुकें। जो चेतावनियाँ मिल रही हैं, वे आपकी रक्षा के लिए हैं — उन्हें अनदेखा न करें।

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