रामाज्ञा प्रश्न / द्वितीय सर्ग / सप्तक 3 / श्लोक 6
रामाज्ञा प्रश्न द्वितीय सर्ग सप्तक 3 श्लोक 6 — राम-नाम लेते हुए दशरथजी का देह-त्याग; समर्पण और राम-स्मरण के अतिरिक्त कोई उपाय नहीं।
॥रामाज्ञा प्रश्न॥ के कुल ३४३ दोहे सात सर्गों में इस प्रकार बँटे हैं कि हर सर्ग में ४९ दोहे आते हैं। द्वितीय सर्ग के तीसरे सप्तक का यह छठा दोहा है; इस सर्ग में कैकेयी और मंथरा के प्रसंग होने से कई दोहे चेतावनी देते हैं।
दशरथजी का देह-त्याग — अब राम-नाम के अतिरिक्त कोई उपाय नहीं।
मूल दोहा: राम राम कहि राम सिय राम सरन भये राउ। सुमिरहु सीताराम अब, नाहिन आन उपाउ॥६॥
शब्दार्थ:
- राम राम कहि = राम-राम कहते हुए
- राम सरन = श्रीराम की शरण
- भये राउ = राजा हो गए, चले गए
- सुमिरहु = स्मरण करो
- अब = अब
- नाहिन = नहीं है
- आन उपाउ = दूसरा उपाय
राम सरन भये राउ = महाराज श्रीराम की शरण चले गए। नाहिन आन उपाउ = दूसरा कोई उपाय नहीं है।
भावार्थ / व्याख्या:
महाराज दशरथ ‘राम-राम, सीता-राम’ कहते हुए श्रीराम की शरण चले गए, अर्थात् उन्होंने देह त्याग दी। तुलसीदास जी कहते हैं — अब तुम भी श्रीसीताराम का स्मरण करो, इस संकट से बचने का दूसरा कोई उपाय नहीं है।
यह दोहा उस अवस्था का वर्णन है जहाँ सारे सांसारिक उपाय समाप्त हो जाते हैं। ऐसे में एकमात्र शरण भगवान का नाम रह जाता है।
शकुन की दृष्टि से यह दोहा गंभीर संकेत देता है। यह बताता है कि वर्तमान परिस्थिति में साधारण प्रयत्न काम नहीं करेंगे। यह समय भागदौड़ का नहीं, बल्कि समर्पण, प्रार्थना और धैर्य का है। परंतु ध्यान रहे — यही समर्पण आगे चलकर मार्ग खोलता है।
शकुन फल:
यह शकुन गंभीर स्थिति और समर्पण की आवश्यकता का सूचक है। निम्नलिखित प्रश्नों में:
- ऐसी स्थिति जहाँ सारे उपाय विफल हो चुके हों
- वृद्धजन या गंभीर रूप से अस्वस्थ व्यक्ति
- किसी बड़े नुकसान या हानि की आशंका
- लंबे समय से चल रही अनसुलझी समस्या
- आध्यात्मिक शरण और प्रार्थना का मार्ग
इस दोहे के आने पर सांसारिक उपायों की सीमा का संकेत मिलता है। यह समय प्रयत्न से अधिक प्रार्थना और धैर्य का है। राम-नाम का स्मरण करें — मार्ग स्वयं खुलेगा।
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