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रामाज्ञा प्रश्न / द्वितीय सर्ग / सप्तक 1 / श्लोक 6

रामाज्ञा प्रश्न द्वितीय सर्ग सप्तक 1 श्लोक 6 — गंगा तट पर निषादराज गुह की सेवा; यह शकुन शुभ-अशुभ दोनों, मिश्रित फल का सूचक है।

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॥रामाज्ञा प्रश्न॥ के कुल ३४३ दोहे सात सर्गों में इस प्रकार बँटे हैं कि हर सर्ग में ४९ दोहे आते हैं। यह पहले सप्तक का छठा दोहा है। द्वितीय सर्ग श्रीराम के राज्याभिषेक की तैयारी से लेकर वनगमन तक के प्रसंगों को समेटे हुए है।

निषादराज गुह की सेवा — यह शकुन शुभ और अशुभ दोनों का मिश्रण है।

मूल दोहा: प्रथम बास सुरसरि निकट सेवा कीन्ही निषाद। कहब सुभासुभ सगुन फल बिसमय हर्ष बिषाद॥६॥

शब्दार्थ:

  • प्रथम बास = पहला निवास
  • सुरसरि = गंगाजी
  • निकट = समीप
  • निषाद = निषादराज गुह
  • सुभासुभ = शुभ और अशुभ
  • बिसमय = आश्चर्य
  • हर्ष = प्रसन्नता
  • बिषाद = शोक

प्रथम बास सुरसरि निकट = पहला निवास गंगाजी के समीप किया। बिसमय हर्ष बिषाद = आश्चर्य, हर्ष और अंत में शोक प्राप्त होगा।

भावार्थ / व्याख्या:

श्रीराम ने वनवास का पहला दिन गंगाजी के समीप शृंगवेरपुर में बिताया और निषादराज गुह ने उनकी सेवा की।

तुलसीदास जी इस शकुन का फल स्पष्ट रूप से मिश्रित बताते हैं — ‘कहब सुभासुभ’, अर्थात् मैं इसे शुभ और अशुभ दोनों कहूँगा। पहले आश्चर्य होगा, फिर हर्ष, और अंत में शोक।

यह ईमानदार और यथार्थवादी संकेत है। इस दोहे के आने पर परिणाम पूरी तरह अनुकूल नहीं होगा — आरंभ में सब अच्छा लगेगा, अप्रत्याशित सहायता भी मिलेगी, परंतु अंतिम परिणाम पूर्ण संतोष नहीं देगा। इसलिए अपेक्षाएँ संतुलित रखें।

शकुन फल:

यह शकुन मिश्रित फल का सूचक है — पहले हर्ष, बाद में कुछ निराशा। निम्नलिखित प्रश्नों में:

  • ऐसा कार्य जिसका आरंभ अच्छा लग रहा हो
  • अप्रत्याशित सहायता या नए व्यक्ति का सहयोग
  • अल्पकालिक लाभ पर दीर्घकालिक संशय
  • यात्रा जिसका पहला चरण सुगम हो
  • कोई सौदा जिसमें कुछ पक्ष अस्पष्ट हों

इस दोहे के आने पर परिणाम मिश्रित रहेगा। आरंभिक सफलता से अति उत्साहित न हों, और अंतिम चरण के लिए वैकल्पिक योजना तैयार रखें।

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