रामाज्ञा प्रश्न / द्वितीय सर्ग / सप्तक 1 / श्लोक 5
रामाज्ञा प्रश्न द्वितीय सर्ग सप्तक 1 श्लोक 5 — राम, लक्ष्मण और सीता का वन-गमन समस्त अमंगलों की जड़; संदेह और वेदना का अशुभ शकुन।
तुलसीदास जी ने ॥रामाज्ञा प्रश्न॥ की रचना उनके लिए की जो किसी निर्णय पर पहुँचने से पहले प्रभु का संकेत जान लेना चाहते हैं। यह पहले सप्तक का पाँचवाँ दोहा है। द्वितीय सर्ग श्रीराम के राज्याभिषेक की तैयारी से लेकर वनगमन तक के प्रसंगों को समेटे हुए है।
राम, लक्ष्मण और सीता का वन-गमन — समस्त अमंगलों की जड़।
मूल दोहा: लखन राम सिय बन गमनु सकल अमंगल मूल। सोच पोच संताप बस कुसमय संसय सूल॥५॥
शब्दार्थ:
- गमनु = गमन, जाना
- सकल अमंगल मूल = समस्त अमंगलों की जड़
- सोच = शोक
- पोच = निम्न कोटि का, तुच्छ
- संताप = संताप, जलन
- बस = वश में
- कुसमय = बुरा समय
- संसय = संदेह
- सूल = वेदना, पीड़ा
सकल अमंगल मूल = समस्त अमंगलों की जड़ है। कुसमय संसय सूल = बुरे समय में संदेहवश वेदना भोगनी होगी।
भावार्थ / व्याख्या:
लक्ष्मणजी, श्रीरामजी और श्रीजानकीजी का वन जाना समस्त अमंगलों की जड़ है। शोक एवं निम्न कोटि के संताप के वश होकर बुरे समय में संदेहवश वेदना भोगनी होगी।
इस दोहे में ‘संसय सूल’ अर्थात् संदेह की पीड़ा का विशेष उल्लेख है। कई बार वास्तविक हानि से अधिक कष्ट उस अनिश्चितता से होता है जिसमें मनुष्य फँस जाता है — न आगे बढ़ पाता है, न पीछे हट पाता है।
शकुन की दृष्टि से यह दोहा अशुभ है। यह उन प्रश्नकर्ताओं के लिए है जो किसी दुविधा में हैं। यह बताता है कि वर्तमान समय निर्णय के लिए अनुकूल नहीं — जल्दबाज़ी में कोई कदम उठाया तो लंबे समय तक पछताना पड़ सकता है।
शकुन फल:
यह शकुन अमंगल और मानसिक कष्ट का सूचक है। निम्नलिखित प्रश्नों में सतर्कता आवश्यक:
- कोई निर्णय जिसमें मन दुविधा में हो
- घर या नौकरी छोड़ने का विचार
- परिवार से दूर जाने या अलग होने का निर्णय
- लंबी चलने वाली चिंता या मानसिक तनाव
- कोई कदम जिसका परिणाम अनिश्चित हो
इस दोहे के आने पर निर्णय टालना ही उचित है। यह समय संदेह और वेदना का है। धैर्य रखें, किसी विश्वसनीय व्यक्ति से परामर्श लें और समय बदलने की प्रतीक्षा करें।
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