रामाज्ञा प्रश्न / द्वितीय सर्ग / सप्तक 1 / श्लोक 4
रामाज्ञा प्रश्न द्वितीय सर्ग सप्तक 1 श्लोक 4 — मंथरा के छल से अयोध्या में विपत्ति और शोक; यह प्रश्न-फल अशुभ है।
इस ग्रंथ की विशेषता यह है कि प्रत्येक दोहा रामकथा का एक प्रसंग भी है और प्रश्न का फल भी। यह पहले सप्तक का चौथा दोहा है। द्वितीय सर्ग श्रीराम के राज्याभिषेक की तैयारी से लेकर वनगमन तक के प्रसंगों को समेटे हुए है।
मंथरा के छल से उत्पन्न विपत्ति — यह प्रश्न-फल अशुभ है।
मूल दोहा: सोचत पुर परिजन सकल, बिकल राउ रनिवास। छल मलीन मन तीय मिस बिपति बिषाद बिनास॥४॥
शब्दार्थ:
- सोचत = चिंतित
- पुर परिजन = नगरवासी और कुटुंबीजन
- बिकल = व्याकुल
- राउ = राजा (दशरथजी)
- रनिवास = अंतःपुर
- छल मलीन मन = छल से भरे मलिन मन वाली
- तीय मिस = स्त्री के बहाने
- बिपति = विपत्ति
- बिनास = विनाश
सोचत पुर परिजन सकल = सभी नगरवासी और कुटुंबीजन चिंतित हैं। बिपति बिषाद बिनास = विपत्ति, शोक और विनाश का साज बन गया।
भावार्थ / व्याख्या:
सभी नगरवासी तथा कुटुंबीजन चिंतित हैं, महाराज दशरथ तथा पूरा रनिवास व्याकुल हो रहा है। देवताओं ने मलिन-मन वाली स्त्री मंथरा के बहाने छल करके विपत्ति, शोक तथा विनाश का साज बना दिया।
इस दोहे में एक महत्वपूर्ण संकेत है — विपत्ति का कारण कोई बड़ी शक्ति नहीं, बल्कि एक साधारण सी दासी थी। छोटी सी बात, गलत समय पर, गलत कान में पड़ जाए तो बड़ा अनर्थ कर देती है।
शकुन की दृष्टि से यह दोहा अशुभ है। यह चेतावनी देता है कि किसी की चुगली, गलत सलाह या कान-भरने से पारिवारिक या व्यावसायिक संबंध बिगड़ सकते हैं। इस समय सुनी-सुनाई बातों पर विश्वास न करें।
शकुन फल:
यह शकुन अशुभ है। निम्नलिखित प्रश्नों में विशेष सावधानी बरतें:
- किसी की सलाह या सुनी-सुनाई बात पर लिया जा रहा निर्णय
- पारिवारिक कलह या रिश्तों में दरार
- कार्यस्थल पर चुगली, अफवाह या राजनीति
- भरोसे के व्यक्ति से धोखे की आशंका
- कोई निर्णय जो भावनाओं में आकर लिया जा रहा हो
इस दोहे के आने पर प्रश्न-फल अशुभ है। किसी की बात पर आँख मूँदकर विश्वास न करें, स्वयं सत्य की जाँच करें और भावावेश में कोई निर्णय न लें।
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