रामाज्ञा प्रश्न / प्रथम सर्ग / सप्तक 6 / श्लोक 3
रामाज्ञा प्रश्न प्रथम सर्ग सप्तक 6 श्लोक 3 — चारों कुमारों का विवाह कर दशरथजी की अयोध्या-वापसी; मांगलिक कार्यों का उत्तम शकुन।
शकुन शुभ है या अशुभ — यह निर्णय ॥रामाज्ञा प्रश्न॥ में उसी प्रसंग से होता है जो चुने हुए दोहे में वर्णित है। इस छठे सप्तक के तीसरा दोहे में प्रथम सर्ग की वही धारा है जो आश्वस्त करती है कि आरंभ शुभ हो तो अंत भी शुभ होता है।
विवाह के बाद अयोध्या-वापसी — मांगलिक कार्यों का उत्तम शकुन।
मूल दोहा: चारिउ कुँवर बियाहि पुर गवने दसरथ राउ। भये मंजु मंगल सगुन गुर सुर संभु पसाउ॥३॥
शब्दार्थ:
- चारिउ कुँवर = चारों कुमार
- बियाहि = विवाह करके
- पुर गवने = नगर को लौट गए
- मंजु = सुंदर
- गुर = गुरु वसिष्ठजी
- सुर = देवता
- संभु = शंकरजी
- पसाउ = प्रसाद, कृपा
चारिउ कुँवर बियाहि पुर गवने = चारों कुमारों का विवाह करके नगर लौटे। गुर सुर संभु पसाउ = गुरु, देवताओं और शंकरजी की कृपा से।
भावार्थ / व्याख्या:
महाराज दशरथ चारों कुमारों का विवाह करके अपने नगर अयोध्या लौट गए। गुरु वसिष्ठजी, देवताओं और शंकरजी की कृपा से सारे शकुन मंगलमय हुए।
इस दोहे में कार्य की पूर्णता का भाव है — जिस उद्देश्य से यात्रा की गई थी, वह पूरा हुआ और सकुशल वापसी भी हुई। किसी भी कार्य में यही सबसे बड़ी सफलता है।
साथ ही तुलसीदास जी यह भी बताते हैं कि इस सफलता का श्रेय गुरु, देवताओं और शंकरजी की कृपा को जाता है। शकुन की दृष्टि से यह दोहा मांगलिक कार्यों में उत्तम फल का सूचक है।
शकुन फल:
यह शकुन मांगलिक कार्यों में उत्तम फल का सूचक है। निम्नलिखित प्रश्नों में:
- विवाह और अन्य मांगलिक आयोजन
- यात्रा से सकुशल वापसी
- किसी कार्य का सफलतापूर्वक समापन
- गुरु या बड़ों के आशीर्वाद से किया गया कार्य
- परिवार के साथ यात्रा या स्थान परिवर्तन
इस दोहे के आने पर मंगल कार्य संबंधी प्रश्न का फल उत्तम है। कार्य पूर्ण होगा और सकुशल समापन होगा। गुरु और बड़ों का आशीर्वाद अवश्य लें।
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