रामाज्ञा प्रश्न / प्रथम सर्ग / सप्तक 5 / श्लोक 4
रामाज्ञा प्रश्न प्रथम सर्ग सप्तक 5 श्लोक 4 — विनय, प्रेम और मधुर संवाद का पुष्प-रूपक; उत्तम प्रश्न-फल का शुभ शकुन।
इस ग्रंथ की विशेषता यह है कि प्रत्येक दोहा रामकथा का एक प्रसंग भी है और प्रश्न का फल भी। प्रथम सर्ग के पाँचवें सप्तक का चौथा दोहा प्रस्तुत है, जिसमें राम-नाम के प्रभाव से बनने वाले शुभ योग की झलक मिलती है।
विनम्रता, प्रेम और संवाद का रूपक — उत्तम प्रश्न-फल।
मूल दोहा: बिनय पराग सुप्रेम रस, सुमन सुभग संबाद। कुसुमित काज रसाल तरु सगुन सुकोकिल नाद॥४॥
शब्दार्थ:
- बिनय पराग = विनम्रता रूपी पुष्प-पराग
- सुप्रेम रस = उत्तम प्रेम रूपी मधु
- सुमन = पुष्प
- सुभग संबाद = सुंदर संभाषण
- कुसुमित = पुष्पित, मौर से लदा
- रसाल तरु = आम का वृक्ष
- सुकोकिल नाद = कोयल की मधुर कूक
बिनय पराग सुप्रेम रस = विनम्रता पराग है और प्रेम मधु है। सगुन सुकोकिल नाद = शकुन कोयल की कूक के समान हैं।
भावार्थ / व्याख्या:
महाराज दशरथ और जनकजी की परस्पर विनम्रता पुष्प-पराग है, उनका उत्तम प्रेम रस अर्थात् मधु है, और उनका आपसी संभाषण पुष्प है।
इस समय का कार्य — श्रीसीता-राम का विवाह — मानो आम के वृक्ष में मौर लगना है, जिसमें होने वाले शकुन कोयल की मधुर कूक के समान हैं।
यह पूरा दोहा एक ही विस्तृत रूपक है, जिसमें तुलसीदास जी बताते हैं कि जहाँ विनम्रता, प्रेम और मधुर संवाद हो, वहाँ का वातावरण स्वयं मंगलमय हो जाता है। शकुन की दृष्टि से यह दोहा उन प्रश्नों में विशेष शुभ है जहाँ बातचीत, समझौता या संबंध बनाना विषय हो।
शकुन फल:
यह शकुन उत्तम है। निम्नलिखित प्रश्नों में परिणाम अनुकूल रहेगा:
- बातचीत, समझौता या अनुबंध
- विवाह की बात आगे बढ़ाना
- रूठे संबंध को सुधारना या मेल-मिलाप
- व्यापारिक साझेदारी की चर्चा
- मधुर संबंध और आपसी विश्वास से जुड़े प्रश्न
इस दोहे के आने पर प्रश्न-फल उत्तम है। विनम्रता और मधुर व्यवहार से बात बनेगी। जो संवाद आरंभ करना है, वह अवश्य करें।
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