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रामाज्ञा प्रश्न / प्रथम सर्ग / सप्तक 4 / श्लोक 1

रामाज्ञा प्रश्न प्रथम सर्ग सप्तक 4 श्लोक 1 — सीता-स्वयंवर का उत्तम समय; कीर्ति, विजय और विवाह के लिए सर्वाधिक शुभ शकुन।

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इस ग्रंथ में उत्तर सीधा नहीं, प्रसंग के माध्यम से मिलता है — जो प्रसंग सामने आए, उसी का भाव प्रश्न का फल बन जाता है। यह दोहा प्रथम सर्ग के चौथे सप्तक में क्रम से पहला है — इस सर्ग में दैव की अनुकूलता और मनोरथ-पूर्ति का भाव प्रमुख है।

यह सप्तक सीता-स्वयंवर के मंगलमय प्रसंग से आरंभ होता है।

मूल दोहा: सीय स्वयंबर समउ भल, सगुन साध सब काज। कीरति बिजय बिबाह विधि, सकल सुमंगल साज॥१॥

शब्दार्थ:

  • सीय = श्री सीताजी
  • स्वयंबर = स्वयंवर
  • समउ = समय
  • भल = उत्तम, अच्छा
  • साध = सिद्ध करने वाला
  • कीरति = कीर्ति, यश
  • बिजय = विजय
  • बिबाह विधि = विवाह आदि कार्य
  • साज = संयोग, व्यवस्था

सगुन साध सब काज = यह शकुन सब कार्यों को सिद्ध करने वाला है। सकल सुमंगल साज = सब प्रकार के मंगलमय संयोग उपस्थित होंगे।

भावार्थ / व्याख्या:

गोस्वामी तुलसीदास जी कहते हैं कि श्रीजानकीजी के स्वयंवर का समय उत्तम है और यह शकुन सभी कार्यों को सिद्ध करने वाला है।

स्वयंवर का प्रसंग स्वयं में शुभता का प्रतीक है — वहाँ योग्यता की परीक्षा हुई, धनुष टूटा, और एक शुभ संबंध बना। इसलिए इस दोहे में कीर्ति, विजय और विवाह — तीनों का उल्लेख है।

‘सकल सुमंगल साज’ का अर्थ है कि केवल एक कार्य नहीं, बल्कि सभी दिशाओं से मंगलमय संयोग उपस्थित होंगे। यह दोहा विवाह संबंधी प्रश्नों के लिए रामाज्ञा प्रश्न के सर्वाधिक शुभ दोहों में गिना जाता है।

शकुन फल:

यह शकुन विवाह और यश-विजय संबंधी प्रश्नों में विशेष शुभ है। निम्नलिखित विषयों में:

  • विवाह, सगाई या रिश्ता तय करना
  • किसी प्रतियोगिता या परीक्षा में सफलता
  • नई साझेदारी या महत्वपूर्ण संबंध
  • यश, सम्मान और प्रतिष्ठा की प्राप्ति
  • कोई भी शुभ कार्य आरंभ करने का समय

इस दोहे के आने पर समय अत्यंत अनुकूल है। विवाह या किसी शुभ संबंध का प्रश्न हो तो निश्चित सफलता मिलेगी। कार्य में विलंब न करें।

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