रामाज्ञा प्रश्न / प्रथम सर्ग / सप्तक 2 / श्लोक 1
रामाज्ञा प्रश्न प्रथम सर्ग सप्तक 2 श्लोक 1 — महाराज दशरथ के सुखी राज्य का वर्णन; भय और रोग की निवृत्ति का शुभ शकुन।
इस ग्रंथ में उत्तर सीधा नहीं, प्रसंग के माध्यम से मिलता है — जो प्रसंग सामने आए, उसी का भाव प्रश्न का फल बन जाता है। प्रस्तुत दोहा प्रथम सर्ग के दूसरे सप्तक में पहला स्थान पर आता है, जहाँ श्रीराम की महिमा और कार्य-सिद्धि के संकेत मिलते हैं।
इस सप्तक से श्रीराम-कथा का आरंभ होता है — महाराज दशरथ के सुखी राज्य के वर्णन से।
मूल दोहा: दसरथ राज न ईति भय, नहिं दुख दुरित दुकाल। प्रमुदित प्रजा प्रसन्न सब, सब सुख सदा सुकाल॥१॥
शब्दार्थ:
- ईति = अतिवृष्टि, अनावृष्टि, टिड्डी, चूहे आदि छह प्राकृतिक उपद्रव
- दुरित = पाप
- दुकाल = दुष्काल, अकाल
- प्रमुदित = अत्यंत प्रसन्न
- सुकाल = सुभिक्ष, अन्न की बहुतायत
दसरथ राज न ईति भय = दशरथ के राज्य में ईति का भय नहीं था। सब सुख सदा सुकाल = सब प्रकार का सुख था और सदा सुभिक्ष रहता था।
भावार्थ / व्याख्या:
गोस्वामी तुलसीदास जी यहाँ महाराज दशरथ के आदर्श राज्य का चित्र खींचते हैं। उस राज्य में ‘ईति’ का भय नहीं था — ईति वे छह प्राकृतिक विपत्तियाँ हैं जो खेती और जनजीवन को नष्ट करती हैं: अतिवृष्टि, अनावृष्टि, टिड्डी, चूहे, पक्षियों का उपद्रव और शत्रु राजाओं का आक्रमण।
न वहाँ दुःख था, न पाप, न अकाल। सारी प्रजा प्रसन्न थी, सब प्रकार का सुख उपलब्ध था और सदा सुभिक्ष बना रहता था।
शकुन की दृष्टि से यह दोहा अत्यंत महत्वपूर्ण है। जिस प्रकार दशरथ के राज्य से सब भय और रोग दूर थे, उसी प्रकार इस दोहे के आने पर प्रश्नकर्ता का भय, रोग या संकट दूर होने का संकेत मिलता है।
शकुन फल:
यह शकुन भय और रोग की निवृत्ति का सूचक है। निम्नलिखित प्रश्नों में परिणाम अनुकूल रहेगा:
- रोग या बीमारी से मुक्ति
- किसी भय, चिंता या आशंका का निवारण
- शत्रु या विरोधी से मिलने वाला भय
- खेती, फसल या प्राकृतिक आपदा संबंधी प्रश्न
- आर्थिक तंगी या अभाव की स्थिति में सुधार
इस दोहे के आने पर भय या रोग दूर होने का स्पष्ट संकेत मिलता है। परिस्थिति धीरे-धीरे सामान्य होगी और सुख-शांति लौटेगी। धैर्य रखें और श्रीराम का स्मरण करते रहें।
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