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रामाज्ञा प्रश्न / षष्ठम सर्ग / सप्तक 7 / श्लोक 6

रामाज्ञा प्रश्न षष्ठम सर्ग सप्तक 7 श्लोक 6 — सीताजी का भूमि-प्रवेश; शोक, संताप, भय, कलह और कलंक का अत्यंत अशुभ अपशकुन।

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॥रामाज्ञा प्रश्न॥ के कुल ३४३ दोहे सात सर्गों में इस प्रकार बँटे हैं कि हर सर्ग में ४९ दोहे आते हैं। षष्ठम सर्ग, सातवें सप्तक और उसमें छठा दोहा — इस सर्ग के शकुन निर्मल विचार और सत्य आचरण का फल बताते हैं।

सीताजी का भूमि-प्रवेश — अत्यंत अशुभ अपशकुन।

मूल दोहा: अनरथ असगुन अति असुभ सीता अवनि प्रबेसु। समय सोक संताप भय कलह कलंक कलेसु॥६॥

शब्दार्थ:

  • अनरथ = अनर्थ करने वाला
  • असगुन = अपशकुन
  • अति असुभ = अत्यंत अशुभ
  • अवनि प्रबेसु = पृथ्वी में प्रवेश
  • समय = यह समय
  • सोक संताप = शोक और संताप
  • भय = भय
  • कलह = झगड़ा
  • कलंक कलेसु = अपयश और कष्ट

अनरथ असगुन अति असुभ सीता अवनि प्रबेसु = सीताजी का पृथ्वी में प्रवेश अनर्थकारी और अत्यंत अशुभ अपशकुन है। समय सोक संताप भय कलह कलंक कलेसु = शोक, संताप, भय, झगड़ा, अपयश और कष्ट का समय है।

भावार्थ / व्याख्या:

श्रीजानकीजी का पृथ्वी में प्रवेश कर जाना अनर्थ करने वाला अत्यंत अशुभ अपशकुन है। यह शोक, संताप, भय, झगड़े, अपयश और कष्ट का समय है।

यह रामकथा का अंतिम और सबसे दुःखद क्षण है। सीताजी ने अंततः धरती माँ की गोद में समा जाना चुना।

तुलसीदास जी इस दोहे में एक साथ छह प्रतिकूल फल गिनाते हैं। शकुन की दृष्टि से यह रामाज्ञा प्रश्न के सर्वाधिक अशुभ दोहों में गिना जाता है। इसके आने पर कोई भी नया कार्य, निर्णय या यात्रा पूर्णतः स्थगित कर देनी चाहिए।

शकुन फल:

यह अत्यंत अशुभ अपशकुन है। सभी प्रश्नों में पूर्ण सतर्कता आवश्यक:

  • कोई भी नया कार्य, निर्णय या यात्रा
  • किसी संबंध का स्थायी रूप से टूटना
  • शोक, अपयश या कलह की स्थिति
  • बड़ी हानि या अपूरणीय क्षति
  • भय और मानसिक कष्ट का दौर

इस दोहे के आने पर स्थिति अत्यंत प्रतिकूल है। हर प्रकार का नया आरंभ स्थगित करें, अपनों का ध्यान रखें और धैर्य से समय बीतने दें। श्रीराम का स्मरण और सत्संग ही इस काल में सहारा है।

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