रामाज्ञा प्रश्न / षष्ठम सर्ग / सप्तक 3 / श्लोक 7
रामाज्ञा प्रश्न षष्ठम सर्ग सप्तक 3 श्लोक 7 — विभीषण को मिला अविचल राज्य, जो आज भी लंका में विराजमान; स्थायी सफलता का शुभ शकुन।
प्रश्न पूछने की परंपरा में मन को एकाग्र कर, श्रीराम का स्मरण करते हुए सर्ग, सप्तक और दोहा — तीनों संख्याएँ चुनी जाती हैं। षष्ठम सर्ग के तीसरे सप्तक का यह सातवाँ दोहा है; परदेस गए व्यक्ति के लौटने से जुड़े प्रश्नों में यह सर्ग विशेष देखा जाता है।
विभीषण का अविचल राज्य — प्रश्न-फल शुभ है।
मूल दोहा: अबिचल राज बिभीषनहि दीन्ह राज रघुराज। अजहुँ बिराजत लंक पुर तुलसी सहित समाज॥७॥
शब्दार्थ:
- अबिचल राज = अविचल, सुस्थिर राज्य
- बिभीषनहि = विभीषण को
- दीन्ह = दिया
- रघुराज = श्रीरघुनाथजी
- अजहुँ = अब भी
- बिराजत = विराजमान हैं
- लंक पुर = लंकापुरी में
- सहित समाज = अपने समाज सहित
अबिचल राज बिभीषनहि दीन्ह राज रघुराज = श्रीरघुनाथजी ने विभीषण को अविचल राज्य दिया। अजहुँ बिराजत लंक पुर = वे अब भी लंकापुरी में विराजमान हैं।
भावार्थ / व्याख्या:
महाराज श्रीरघुनाथजी ने विभीषण को अविचल अर्थात् सुस्थिर राज्य दिया। तुलसीदास जी कहते हैं कि वे अब भी अपने समाज के साथ लंकापुरी में विराजमान हैं।
‘अबिचल’ शब्द ही इस दोहे की कुंजी है। जो श्रीराम ने दिया वह अस्थायी नहीं था — वह चिरस्थायी था।
पिछले दोहे में रावण का सकुल पतन था और इस दोहे में विभीषण का अविचल राज्य। दोनों एक ही कुल के थे, परंतु परिणाम विपरीत — क्योंकि मार्ग अलग था। तुलसीदास जी इस प्रश्न-फल को शुभ कहते हैं। शकुन की दृष्टि से यह स्थायी सफलता का सूचक है।
शकुन फल:
यह प्रश्न-फल शुभ है और स्थायी सफलता का सूचक है। निम्नलिखित प्रश्नों में:
- स्थायी पद, अधिकार या संपत्ति की प्राप्ति
- लंबे समय तक टिकने वाली सफलता
- सही मार्ग चुनने का दीर्घकालिक फल
- किसी को स्थायी व्यवस्था या सुरक्षा देना
- पीढ़ियों तक चलने वाला लाभ
इस दोहे के आने पर प्रश्न-फल शुभ है। जो मिलेगा वह अस्थायी नहीं, अविचल होगा। सही मार्ग का यही सबसे बड़ा फल है।
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